अन्वयः
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आस्थित-विषाद-धियः वनचराः सुकृतैः अभूरि-वासर-कृतम् अनन्य-भवम् तत् वैभवम् उपलभ्य शतयज्वनः वसतिम् उपतस्थुः ।
English Summary
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The forest-dwelling spies, their minds filled with distress, having learned of that unparalleled glory achieved by Arjuna's good deeds in just a few days, approached the abode of Indra.
सारांश
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अर्जुन के उस कठिन तप और अलौकिक प्रभाव को देखकर वन में रहने वाले किरात विस्मित हो गए। वे विषादपूर्ण मन से इंद्र के पास पहुँचे, क्योंकि उन्होंने पहले कभी ऐसा वैभव नहीं देखा था।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
तदिति ॥ सुकृतैस्तपोभिः करणैः अभूरिभिः कतिपयैरेव वासरैः कृतं तत्पूर्वोक्तं वैभवमतोऽन्यस्य न भवतीत्यनन्यभवम्। अन्यस्यासंभावीत्यर्थः । पचाद्यजन्तोत्तरपदेन नञ्समासः। उपलभ्य निश्चित्यास्थितविषादाः प्राप्तखेदा धियो येषां ते वनचराः।
तत्पुरुषे कृति बहुलम् (अष्टाध्यायी ६.३.१४ ) इति बहुलग्रहणाल्लुक् । शतेन शतस्य वा मखानां यज्वनः शतक्रतोः । अत्र संख्येयविशेषलाभो यजिसंनिधानादवगन्तव्यः । यज्वा तु विधिनेष्टवान् इत्यमरः (अमरकोशः २.७.१० ) । सुयजोर्ङ्वनिप् (अष्टाध्यायी ३.२.१०३ ) । वसतिमुपतस्थुः प्रापुः ॥
पदच्छेदः
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| तत् | तद् (२.१) | that |
| अभूरिवासरकृतम् | अभूरि–वासर–कृत (२.१) | achieved in not many days |
| सुकृतैः | सुकृत (३.३) | by good deeds |
| उपलभ्य | उपलभ्य (उप√लभ्+ल्यप्) | having learned of |
| वैभवम् | वैभव (२.१) | glory |
| अनन्यभवम् | अनन्य–भव (२.१) | unparalleled |
| उपतस्थुः | उपतस्थुः (उप√स्था कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | approached |
| आस्थितविषादधियः | आस्थित–विषाद–धी (१.३) | whose minds were filled with distress |
| शतयज्वनः | शतयज्वन् (६.१) | of Indra (performer of 100 sacrifices) |
| वनचराः | वनचर (१.३) | The forest-dwellers |
| वसतिम् | वसति (२.१) | the abode |
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | द | भू | रि | वा | स | र | कृ | तं | सु | कृ | तै |
| रु | प | ल | भ्य | वै | भ | व | म | न | न्य | भ | वम् |
| उ | प | त | स्थु | रा | स्थि | त | वि | षा | द | धि | यः |
| श | त | य | ज्व | नो | व | न | च | रा | व | स | तिम् |
| स | ज | स | स | ||||||||
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