अधिरुह्य पुष्पभरनम्रशिखैः
परितः परिष्कृततलां तरुभिः ।
मनसः प्रसत्तिमिव मूर्ध्नि गिरेः
शुचिमाससाद स वनान्तभुवम् ॥
अधिरुह्य पुष्पभरनम्रशिखैः
परितः परिष्कृततलां तरुभिः ।
मनसः प्रसत्तिमिव मूर्ध्नि गिरेः
शुचिमाससाद स वनान्तभुवम् ॥
परितः परिष्कृततलां तरुभिः ।
मनसः प्रसत्तिमिव मूर्ध्नि गिरेः
शुचिमाससाद स वनान्तभुवम् ॥
अन्वयः
AI
सः पुष्पभरनम्रशिखैः तरुभिः परितः परिष्कृततलां शुचिं वनान्तभुवं गिरेः मूर्ध्नि अधिरुह्य मनसः प्रसत्तिम् इव आससाद ।
English Summary
AI
Having climbed to the peak of the mountain, he reached a pure forest region, its ground adorned all around by trees whose tops were bent with the weight of flowers. There, he attained a state like the very clarity of mind.
सारांश
AI
फूलों से लदी झुकी हुई शाखाओं वाले वृक्षों से सुसज्जित पर्वत के शिखर पर अर्जुन एक ऐसी वन भूमि पर पहुंचे, जो मन की प्रसन्नता के समान निर्मल और पवित्र थी।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अधिरुह्येति ॥ सोऽर्जुनोऽधिरुह्य । अर्थाद्गिरिमिति शेषः । पुष्पभरेण नम्रशिखैर्नताग्रैस्तरुभिः परितः परिष्कृततलां भूषितस्वरूपाम् । 'अधःस्वरूपयोरस्त्री तलम्' इत्यमरः। 'संपर्युपेभ्यः करोतौ
भूषणे (अष्टाध्यायी १.४.६४ ) इति सुडागमः। शुचिं शुद्धाम् । अतएव मनसः प्रसत्तिमिव मूर्तं मनःप्रसादमिव स्थिताम् ।तद्धेतौ तद्भावोत्प्रेक्षा। गिरेर्मूर्ध्नि वनान्तभुवमाससाद । अन्तःशब्दः स्वरूपवचनः । 'अन्तोऽध्यवसिते मृत्यौ स्वरूपे निश्चयेऽन्तिके' इति वैजयन्ती॥
पदच्छेदः
AI
| अधिरुह्य | अधिरुह्य (अधि√रुह्+ल्यप्) | having climbed |
| पुष्पभरनम्रशिखैः | पुष्प–भर–नम्र–शिखा (३.३) | by those with tops bent by the weight of flowers |
| परितः | परितः | all around |
| परिष्कृततलां | परिष्कृत (परि√कृ+क्त)–तल (२.१) | whose ground was adorned |
| तरुभिः | तरु (३.३) | by trees |
| मनसः | मनस् (६.१) | of the mind |
| प्रसत्तिम् | प्रसत्ति (प्र√सद्+क्तिन्, २.१) | clarity |
| इव | इव | like |
| मूर्ध्नि | मूर्धन् (७.१) | to the peak |
| गिरेः | गिरि (६.१) | of the mountain |
| शुचिम् | शुचि (२.१) | a pure |
| आससाद | आससाद (आ√सद् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | attained |
| स | तद् (१.१) | he |
| वनान्तभुवम् | वन–अन्त–भू (२.१) | forest region |
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | धि | रु | ह्य | पु | ष्प | भ | र | न | म्र | शि | खैः |
| प | रि | तः | प | रि | ष्कृ | त | त | लां | त | रु | भिः |
| म | न | सः | प्र | स | त्ति | मि | व | मू | र्ध्नि | गि | रेः |
| शु | चि | मा | स | सा | द | स | व | ना | न्त | भु | वम् |
| स | ज | स | स | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.