अन्वयः
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बर्हिचन्द्रिकनिभं दानपयसां पटलं सरितः ऐभपतिम् अवगाढम् ईक्षितुम् इव विकसद्विलोचनशतं सत् अस्य बहु धृतिं विदधे ।
English Summary
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The mass of ichor, resembling the eyes on a peacock's tail, which seemed to be a hundred blooming eyes of the river trying to gaze at the elephant king submerged in it, brought great delight to him (Arjuna).
सारांश
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हाथियों के मदजल से युक्त नदी अर्जुन को ऐसी लगी मानो वह अपने भीतर खिलते हुए सैकड़ों कमलों रूपी नेत्रों से उस श्रेष्ठ पुरुष को कौतूहलवश देख रही हो।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
बहिति ॥ बर्हिचन्द्रकनिभं मयूरमेचकसदृशम् ।
समौ चन्द्रकमेचकौ इत्यमरः (अमरकोशः २.५.३३ ) । बह्वनेकधा दानपयसां पटलम् । जातावेकवचनम् । बहवो मदाम्बुबिन्दव इत्यर्थः । अवगाढमन्तःप्रविष्टम् । गाहेः कर्तरि क्तः। इभपतिमीक्षितुं विकसदुन्मिषत्सरितो विलोचनशतमिवेत्युत्प्रेक्षा । अस्यार्जुनस्य धृतिं प्रीतिं विदधे चकार । प्रतिबोधजृम्भणविभिन्नमुखी पुलिने सरोरुहदशा ददृशेः। पतदच्छमौक्तिकमणिप्रकरा गलदश्रुबिन्दुरिव शुक्तिवधूः
पदच्छेदः
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| बहु | बहु | great |
| बर्हिचन्द्रिकनिभं | बर्हिन्–चन्द्रिका–निभ (१.१) | resembling the eyes on a peacock's tail |
| विदधे | विदधे (वि√धा कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | brought |
| धृतिम् | धृति (२.१) | delight |
| अस्य | इदम् (६.१) | to him |
| दानपयसां | दान–पयस् (६.३) | of the ichor |
| पटलम् | पटल (१.१) | the mass |
| अवगाढम् | अवगाढ (अव√गाह्+क्त, २.१) | submerged |
| ईक्षितुम् | ईक्षितुम् (√ईक्ष्+तुमुन्) | to gaze at |
| इव | इव | as if |
| ऐभपतिं | इभ–पति (२.१) | the elephant king |
| विकसद्विलोचनशतं | विकसत् (वि√कस्+शतृ)–विलोचन–शत (१.१) | a hundred blooming eyes |
| सरितः | सरित् (६.१) | of the river |
छन्दः
प्रमिताक्षरा [१२: सजसस]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ब | हु | ब | र्हि | च | न्द्रि | क | नि | भं | वि | द | धे |
| धृ | ति | म | स्य | दा | न | प | य | सां | प | ट | लम् |
| अ | व | गा | ढ | मी | क्षि | तु | मि | वै | भ | प | तिं |
| वि | क | स | द्वि | लो | च | न | श | तं | स | रि | तः |
| स | ज | स | स | ||||||||
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