अथाभिपश्यन्निव विद्विषः पुरः
पुरोधसारोपितहेतिसंहतिः ।
बभार रम्योऽपि वपुः स भीषणं
गतः क्रियां मन्त्र इवाभिचारिकीम् ॥
अथाभिपश्यन्निव विद्विषः पुरः
पुरोधसारोपितहेतिसंहतिः ।
बभार रम्योऽपि वपुः स भीषणं
गतः क्रियां मन्त्र इवाभिचारिकीम् ॥
पुरोधसारोपितहेतिसंहतिः ।
बभार रम्योऽपि वपुः स भीषणं
गतः क्रियां मन्त्र इवाभिचारिकीम् ॥
अन्वयः
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अथ पुरोधसा आरोपित-हेति-संहतिः सः, पुरः विद्विषः अभिपश्यन् इव, आभिचारिकीम् क्रियाम् गतः मन्त्रः इव, रम्यः अपि (सन्) भीषणम् वपुः बभार ।
English Summary
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Then, with the collection of weapons placed upon him by the priest (Vyasa), he, though charming, assumed a terrifying form, as if looking at his enemies before him. He was like a spell that has undergone a malevolent rite.
सारांश
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शत्रुओं को सन्मुख देखते हुए और अभिमंत्रित शस्त्रों को धारण कर, अर्जुन का सुंदर शरीर किसी विध्वंसक अनुष्ठान के मंत्र के समान अत्यंत भयंकर और तेजस्वी हो गया।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अथेति ॥ अथ विद्विषः शत्रून्पुरोऽभिपश्यन्निव स्थितस्तथा पुरोधसा धौम्येनारोपिता समन्त्रमाहिता हेतिसंहतिरायुधकलापो यस्य स तथोक्तः ।
हेतिर्ज्वालाङ्कुरायुधे इति वैजयन्ती । सोऽर्जुनो रम्यः सौम्यः सन्नपि। अभिचारः परहिंसा प्रयोजनं यस्याः साभिचारिकी। प्रयोजनम् (अष्टाध्यायी ५.१.१०९ ) इति ठञ् । तां क्रियां गतः । अभिचारकर्मणि नियुक्त इत्यर्थः । मन्त्र इव । रम्यः प्रकृत्या रमणीयः । भीषयत इति भीषणम् । नन्द्यादित्वाल्लघुप्रत्ययः । वपुर्बभार। प्रशान्तो मन्त्रः प्रयोगभेदादिव ।सोऽप्यवस्थाभेदाद्भीषणो बभूवेत्यर्थः ॥ उक्तमायुधारोपणं विवृण्वन्प्रस्थानमाह त्रिभिः
पदच्छेदः
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| अथ | अथ | Then |
| अभिपश्यन् | अभिपश्यत् (अभि√दृश्+शतृ, १.१) | as if looking at |
| इव | इव | as if |
| विद्विषः | विद्विष् (२.३) | the enemies |
| पुरः | पुरस् | in front |
| पुरोधसारोपितहेतिसंहतिः | पुरोधस् (३.१)–आरोपित (आ√रुह्+णिच्+क्त)–हेति–संहति (१.१) | he on whom the collection of weapons was placed by the priest |
| बभार | बभार (√भृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | bore |
| रम्यः | रम्य (१.१) | charming |
| अपि | अपि | although |
| वपुः | वपुस् (२.१) | a body |
| सः | तद् (१.१) | he |
| भीषणम् | भीषण (२.१) | terrible |
| गतः | गत (√गम्+क्त, १.१) | having undergone |
| क्रियाम् | क्रिया (२.१) | a rite |
| मन्त्रः | मन्त्र (१.१) | a spell |
| इव | इव | like |
| आभिचारिकीम् | आभिचारिकी (२.१) | malevolent |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | था | भि | प | श्य | न्नि | व | वि | द्वि | षः | पु | रः |
| पु | रो | ध | सा | रो | पि | त | हे | ति | सं | ह | तिः |
| ब | भा | र | र | म्यो | ऽपि | व | पुः | स | भी | ष | णं |
| ग | तः | क्रि | यां | म | न्त्र | इ | वा | भि | चा | रि | कीम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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