तदाशु कुर्वन्वचनं महर्षे-
र्मनोरथान्नः सफलीकुरुष्व ।
प्रत्यागतं त्वास्मि कृतार्थमेव
स्तनोपपीडं परिरब्धुकामा ॥
तदाशु कुर्वन्वचनं महर्षे-
र्मनोरथान्नः सफलीकुरुष्व ।
प्रत्यागतं त्वास्मि कृतार्थमेव
स्तनोपपीडं परिरब्धुकामा ॥
र्मनोरथान्नः सफलीकुरुष्व ।
प्रत्यागतं त्वास्मि कृतार्थमेव
स्तनोपपीडं परिरब्धुकामा ॥
अन्वयः
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तत् महर्षेः वचनम् आशु कुर्वन् नः मनोरथान् सफलीकुरुष्व । (अहम्) कृतार्थम् एव प्रत्यागतम् त्वा स्तन-उपपीडम् परिरब्धुकामा अस्मि ।
English Summary
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Therefore, by quickly following the great sage's command, fulfill our desires. I am desirous of embracing you tightly, with my breasts pressed against you, upon your return after having accomplished your purpose.
सारांश
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महर्षि व्यास के आदेश का शीघ्र पालन कर हमारी मनोकामना पूर्ण करें। मैं आपके सफल होकर लौटने पर सप्रेम आलिंगन करने की तीव्र इच्छा रखती हूँ।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
तदिति ॥ तत्तस्मात्कारणात् । आशु शीघ्रं महर्षेर्वचनं कुर्वन् । तपस्यन्नित्यर्थः। नोऽस्माकं मनोरथान्सफलीकुरुष्व । अरिनिर्यातनेनास्मान्प्रतिष्ठापयेत्यर्थः । प्रार्थनायां लोट्। किंच कृतार्थं कृतकृत्यं प्रत्यागतमेव त्वा त्वाम् ।
त्वामौ द्वितीयायाः (अष्टाध्यायी ८.१.२३ ) इति त्वादेशः । स्तनयोरुपपीड्य स्तनोपपीडम् । सप्तम्यां चोपपीडरुधकर्षः (अष्टाध्यायी ३.४.४९ ) इति णमुल् । परिरब्धुं कामो यस्याः सा परिरब्धुकामास्मि । आलिङ्गितुमिच्छामीत्यर्थः। तुंकाममनसोरपि इति मकारलोपः। प्राक्कार्यसिद्धेः प्रमदालिङ्गनमपि न प्रीतिदमिति भावः ॥
पदच्छेदः
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| तत् | तत् | Therefore |
| आशु | आशु | quickly |
| कुर्वन् | कुर्वत् (√कृ+शतृ, १.१) | by doing |
| वचनम् | वचन (२.१) | the command |
| महर्षेः | महर्षि (६.१) | of the great sage |
| मनोरथान् | मनोरथ (२.३) | desires |
| नः | अस्मद् (६.३) | our |
| सफलीकुरुष्व | सफलीकुरुष्व (सफली√कृ कर्तरि लोट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | make fruitful |
| प्रत्यागतम् | प्रत्यागत (प्रति+आ√गम्+क्त, २.१) | returned |
| त्वा | युष्मद् (२.१) | you |
| अस्मि | अस्मि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I am |
| कृतार्थम् | कृतार्थ (२.१) | having accomplished your purpose |
| एव | एव | indeed |
| स्तनोपपीडम् | स्तन–उपपीडम् (उप√पीड्+णमुल्) | so as to press the breasts |
| परिरब्धुकामा | परिरब्धुकाम (परि√रभ्+तुमुन्+कामच्, १.१) | desirous of embracing |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | दा | शु | कु | र्व | न्व | च | नं | म | ह | र्षे |
| र्म | नो | र | था | न्नः | स | फ | ली | कु | रु | ष्व |
| प्र | त्या | ग | तं | त्वा | स्मि | कृ | ता | र्थ | मे | व |
| स्त | नो | प | पी | डं | प | रि | र | ब्धु | का | मा |
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