आक्षिप्यमाणं रिपुभिः प्रमादा-
न्नागैरिवालूनसटं मृगेन्द्रम् ।
त्वां धूरियं योग्यतयाधिरूढा
दीप्त्या दिनश्रीरिव तिग्मरश्मिम् ॥
आक्षिप्यमाणं रिपुभिः प्रमादा-
न्नागैरिवालूनसटं मृगेन्द्रम् ।
त्वां धूरियं योग्यतयाधिरूढा
दीप्त्या दिनश्रीरिव तिग्मरश्मिम् ॥
न्नागैरिवालूनसटं मृगेन्द्रम् ।
त्वां धूरियं योग्यतयाधिरूढा
दीप्त्या दिनश्रीरिव तिग्मरश्मिम् ॥
अन्वयः
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रिपुभिः प्रमादात् आक्षिप्यमाणम्, नागैः आलूनसटम् मृगेन्द्रम् इव, त्वाम् इयम् धूः योग्यतया अधिरूढा, दीप्त्या दिनश्रीः तिग्मरश्मिम् इव ।
English Summary
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This burden of responsibility has fallen upon you due to your worthiness, just as the beauty of the day rests on the brilliant sun. You are like a lion whose mane has been torn by elephants, being assailed by enemies due to your negligence.
सारांश
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शत्रुओं द्वारा अपमानित होने पर भी विजय का यह गुरुतर भार आपकी योग्यता के कारण आप पर ही आया है, जैसे सूर्य दिन के प्रकाश का भार वहन करता है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
आक्षिप्येति ॥ प्रमादात्प्रज्ञाहीनत्वात् । नतु दौर्बल्यादिति भावः । रिपुभिराक्षिप्यमाणमधिक्षिप्यमाणमतएव प्रमादात् । नागैर्गजैः।
ग्रहेभाहिगजा नागाः इति वैजयन्ती । आलूनसटमाक्षिप्तकेसरम् । सटा जटाकेसरयोः इत्यमरः।मृगेन्द्रं सिंहमिवस्थितम् । स्वामियं धूः कार्यभारः। तिग्मरश्मिं सूर्यं दीप्त्या दिनश्रीरिव योग्यतया निर्वाहकतयाधिरूढारूढवती । कर्तरि क्तः । त्वदधीनेत्यर्थः ॥ पूर्वं निर्व्यवसायस्य स क्षत्रियः इत्यादिना दोष उक्तः। संप्रति व्यवसायिनो गुणमाह
पदच्छेदः
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| आक्षिप्यमाणम् | आक्षिप्यमाण (आ√क्षिप्+यक्+शानच्, २.१) | being assailed |
| रिपुभिः | रिपु (३.३) | by enemies |
| प्रमादात् | प्रमाद (५.१) | due to negligence |
| नागैः | नाग (३.३) | by elephants |
| इव | इव | like |
| आलूनसटम् | आलून (आ√लू+क्त)–सटा (२.१) | a lion whose mane is torn |
| मृगेन्द्रम् | मृगेन्द्र (२.१) | a lion |
| त्वाम् | युष्मद् (२.१) | you |
| धूः | धुर् (१.१) | this burden |
| इयम् | इदम् (१.१) | this |
| योग्यतया | योग्यता (३.१) | by your worthiness |
| अधिरूढा | अधिरूढ (अधि√रुह्+क्त, १.१) | has mounted |
| दीप्त्या | दीप्ति (३.१) | with brilliance |
| दिनश्रीः | दिनश्री (१.१) | the beauty of the day |
| इव | इव | like |
| तिग्मरश्मिम् | तिग्मरश्मि (२.१) | the sun |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | क्षि | प्य | मा | णं | रि | पु | भिः | प्र | मा | दा |
| न्ना | गै | रि | वा | लू | न | स | टं | मृ | गे | न्द्रम् |
| त्वां | धू | रि | यं | यो | ग्य | त | या | धि | रू | ढा |
| दी | प्त्या | दि | न | श्री | रि | व | ति | ग्म | र | श्मिम् |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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