दुःशासनामर्षरजोविकीर्णै-
रेभिर्विनार्थैरिव भाग्यनाथैः ।
केशैः कदर्थीकृतवीर्यसारः
कच्चित्स एवासि धनंजयस्त्वम् ॥
दुःशासनामर्षरजोविकीर्णै-
रेभिर्विनार्थैरिव भाग्यनाथैः ।
केशैः कदर्थीकृतवीर्यसारः
कच्चित्स एवासि धनंजयस्त्वम् ॥
रेभिर्विनार्थैरिव भाग्यनाथैः ।
केशैः कदर्थीकृतवीर्यसारः
कच्चित्स एवासि धनंजयस्त्वम् ॥
अन्वयः
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दुःशासन-अमर्ष-रजः-विकीर्णैः, अर्थैः विना इव, एभिः भाग्यनाथैः केशैः कदर्थीकृतवीर्यसारः त्वम् कच्चित् सः एव धनञ्जयः असि?
English Summary
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With this hair, scattered with the dust of indignation towards Duhshasana, like masters of fortune without purpose, and with the essence of your valor rendered worthless—are you indeed that same Dhananjaya?
सारांश
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दुःशासन द्वारा अपमानित और बिखरे हुए इन केशों के बीच, क्या आप वही पराक्रमी धनंजय हैं? आपका पौरुष और शौर्य आज निष्प्रभावी प्रतीत हो रहा है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
दुःशासनेति ॥ पुनश्च । दुःशासनस्य कर्तुरामर्ष आमर्षणमाकर्षणं स एव रजो धूलिः। मालिन्यहेतुत्वादिति भावः। तेन विकीर्णैर्विक्षिप्तैरतएव विनाथैरिव स्थितवतां युष्माकमसत्त्वप्रायत्वादनाथैरिव ।स्थितैरित्युत्प्रेक्षा । अन्यथा कथमियं दुर्दशेति भावः। किंतु भाग्यनाथैर्दैवमात्रशरणैः । अन्यथा स्वरूपमपि लुप्येतेति भावः । एभिः परिदृश्यमानैः। असंयमितैरिति भावः । केशैः शिरोरुहैः कुत्सितोऽर्थो वस्तु कदर्थः।
अर्थोऽभिधेयरैवस्तुप्रयोजननिवृत्तिषु इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.९३ ) । कोः कत्तत्पुरुषेऽचि इति कुशब्दस्य कदादेशः । कदर्थीकृतौ गार्ह्यार्थीकृतौ वीर्यसारौ शौर्यबले यस्य स तथोक्तः । इत्थं पूर्वविलक्षणस्त्वं स एव धनंजयोऽसि कश्चित् । कच्चित्कामप्रवेदने इत्यमरः । स एव चेत्त्वं नैवमस्मानुपक्षस इति भावः ॥ अथाप्युपेक्षणे दोषमाहस क्षत्रियस्त्राणसहः सतां यस्तत्कार्मुकं कर्मसु यस्य शक्तिः । वहन्द्वयीं यद्यफलेऽर्थजाते करोत्यसंस्कारहतामिवोक्तिम्
पदच्छेदः
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| दुःशासनामर्षरजोविकीर्णैः | दुःशासन–अमर्ष–रजस्–विकीर्ण (वि√कॄ+क्त, ३.३) | scattered with the dust of indignation towards Duhshasana |
| एभिः | इदम् (३.३) | by these |
| विना | विना | without |
| अर्थैः | अर्थ (३.३) | purpose |
| इव | इव | like |
| भाग्यनाथैः | भाग्य–नाथ (३.३) | masters of fortune |
| कैशैः | केश (३.३) | with hair |
| कदर्थीकृतवीर्यसारः | कदर्थीकृत–वीर्य–सार (१.१) | whose essence of valor is rendered worthless |
| कच्चित् | कच्चित् | is it that |
| सः | तद् (१.१) | that |
| एव | एव | same |
| असि | असि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | are |
| धनञ्जयः | धनञ्जय (१.१) | Dhananjaya |
| त्वम् | युष्मद् (१.१) | you |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दुः | शा | स | ना | म | र्ष | र | जो | वि | की | र्णै |
| रे | भि | र्वि | ना | र्थै | रि | व | भा | ग्य | ना | थैः |
| के | शैः | क | द | र्थी | कृ | त | वी | र्य | सा | रः |
| क | च्चि | त्स | ए | वा | सि | ध | नं | ज | य | स्त्वम् |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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