यशोऽधिगन्तुं सुखलिप्सया वा
मनुष्यसंख्यामतिवर्तितुं वा ।
निरुत्सुकानामभियोग्गभाजां
समुत्सुकेवाङ्कमुपैति सिद्धिः ॥
यशोऽधिगन्तुं सुखलिप्सया वा
मनुष्यसंख्यामतिवर्तितुं वा ।
निरुत्सुकानामभियोग्गभाजां
समुत्सुकेवाङ्कमुपैति सिद्धिः ॥
मनुष्यसंख्यामतिवर्तितुं वा ।
निरुत्सुकानामभियोग्गभाजां
समुत्सुकेवाङ्कमुपैति सिद्धिः ॥
सारांश
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जो व्यक्ति यश, सुख या प्रसिद्धि की लालसा से मुक्त होकर केवल अपने पुरुषार्थ में लगा रहता है, सिद्धि स्वयं उत्सुक होकर उसका वरण करती है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
यश इति ॥ यशोऽधिगन्तुम् । कीर्ति लब्धुमित्यर्थः । सुखस्य लिप्सया लब्धुमिच्छया वा । मनुष्यसंख्यां मनुष्यगणनामतिवर्तितुमतिक्रमितुं वा । अमानुषं कर्म कर्तुं वेत्यर्थः । अभियोगभाजामभिनिवेशवतां निरुत्सुकानामनुत्सुकानाम् । अदुर्मनायमानानामित्यर्थः । सिद्धिः पूर्वोक्तं यशः सुखाद्यर्थसिद्धिश्च । समुत्सुकेवानुरक्तकान्तेस्वाङ्कमुत्सङ्गमन्तिकं चोपैति। तस्मादसद्विरहदुःखमातपःसिद्धेः सोढव्यमिति भावः ॥ अथास्य मन्यूद्दीपनद्वारा तपःप्रवृत्तिं प्रथयितुमरिनिकारं तावच्चतुर्भिरुद्घाटयति
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | शो | ऽधि | ग | न्तुं | सु | ख | लि | प्स | या | वा |
| म | नु | ष्य | सं | ख्या | म | ति | व | र्ति | तुं | वा |
| नि | रु | त्सु | का | ना | म | भि | यो | ग्ग | भा | जां |
| स | मु | त्सु | के | वा | ङ्क | मु | पै | ति | सि | द्धिः |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||
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