मग्नां द्विषच्छद्मनि पङ्कभूते
सम्भवानां भूतिमिवोद्धरिष्यन् ।
आधिद्विषामा तपसां प्रसिद्धे-
रस्मद्विना मा भृशमुन्मनीभूः ॥
मग्नां द्विषच्छद्मनि पङ्कभूते
सम्भवानां भूतिमिवोद्धरिष्यन् ।
आधिद्विषामा तपसां प्रसिद्धे-
रस्मद्विना मा भृशमुन्मनीभूः ॥
सम्भवानां भूतिमिवोद्धरिष्यन् ।
आधिद्विषामा तपसां प्रसिद्धे-
रस्मद्विना मा भृशमुन्मनीभूः ॥
सारांश
AI
शत्रुओं के छल-कपट रूपी कीचड़ में फंसी कुल-मर्यादा के उद्धार के लिए तपस्या करने हेतु जाते समय, आप हमारे वियोग में अत्यधिक दुखी न हों।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
मग्नामिति ॥ पङ्कभूते पङ्कोपमिते ।
भूतं क्ष्मादौ पिशाचादौ न्याय्ये सत्योपमानयोः इति विश्वः । द्विषच्छद्मनि शत्रुकपटे मग्नाम् । दुरुद्धरामित्यर्थः । संभावनां योग्यताम् । गौरवमिति यावत् । भूतिं संपदमिव । भूतिर्मस्मनि संपदि इत्यमरः । उद्धरिष्यन् । उद्धारकस्त्वमिति शेषः । आधिद्विषां दुःखच्छिदां तपसामा प्रसिद्धेः सम्यक्सिद्धिपर्यन्तमस्मद्विना । अस्माभिर्विनेत्यर्थः । पृथग्विना— (अष्टाध्यायी २.३.३२ ) इत्यादिना विकल्पात्पञ्चमी । भृशं मोन्मनीभूः । अस्मद्विरहाद्दुर्मना मा भूरित्यर्थः । दौर्मनस्यस्य तपःपरिपन्थित्वादिति भावः।माङि- इत्याशीरर्थे लुङ्।न माङयोगे इत्यडागमप्रतिषेधः । अनुन्मना उन्मनाः संपद्यमान उन्मनी । अभूततद्भावे च्वि: । अरुर्मनश्चक्षुश्चेतोरहोरजसां लोपश्च (अष्टाध्यायी ५.४.५१ ) इति सकारलोपः । अस्य च्चौ इतीकारः ॥ अथानौत्सुक्यदार्ढ्यार्थं तस्य सर्वार्थसिद्धिनिदानत्वमाह
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | ग्नां | द्वि | ष | च्छ | द्म | नि | प | ङ्क | भू | ते |
| स | म्भ | वा | नां | भू | ति | मि | वो | द्ध | रि | ष्यन् |
| आ | धि | द्वि | षा | मा | त | प | सां | प्र | सि | द्धे |
| र | स्म | द्वि | ना | मा | भृ | श | मु | न्म | नी | भूः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.