धैर्यावसादेन हृतप्रसादा
वन्यद्विपेनेव निदाघसिन्धुः ।
निरुद्धबाष्पोदयसन्नकण्ठ-
मुवाच कृच्छ्रादिति राजपुत्री ॥
धैर्यावसादेन हृतप्रसादा
वन्यद्विपेनेव निदाघसिन्धुः ।
निरुद्धबाष्पोदयसन्नकण्ठ-
मुवाच कृच्छ्रादिति राजपुत्री ॥
वन्यद्विपेनेव निदाघसिन्धुः ।
निरुद्धबाष्पोदयसन्नकण्ठ-
मुवाच कृच्छ्रादिति राजपुत्री ॥
सारांश
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ग्रीष्मकालीन नदी के समान धैर्य खो चुकी द्रौपदी ने, रुँधे हुए कंठ से और बड़े कष्ट के साथ अर्जुन से विदाई के ये शब्द कहे।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
धैर्यति ॥ वन्यद्विपेन । वन्यग्रहणमुच्छृङ्खलत्वद्योतनार्थम् । निदाघसिन्धुर्ग्रीष्मनदीव निदाधग्रहणं दौर्बल्यद्योतनार्थम् । धैर्यावसादेन धैर्यभ्रंशेन कर्त्रा हृतप्रसादा हृतनैर्मल्यां। क्षोभं गमितेत्यर्थः । राजपुत्री क्षत्रियसुता द्रौपदी । अतः क्षात्रयुक्तमेव वक्ष्यतीति भावः । निरुद्धबाष्पोदयं संरुद्धरोदनं सन्नकण्ठं हीनस्वरम् ।अथ तयोरुभयोः कृतबहुव्रीह्योः क्रियाविशेषणयोर्विशेषणसमासः। कृच्छ्रात्कथंचिदिति वक्ष्यमाणमुवाच ॥
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| धै | र्या | व | सा | दे | न | हृ | त | प्र | सा | दा |
| व | न्य | द्वि | पे | ने | व | नि | दा | घ | सि | न्धुः |
| नि | रु | द्ध | बा | ष्पो | द | य | स | न्न | क | ण्ठ |
| मु | वा | च | कृ | च्छ्रा | दि | ति | रा | ज | पु | त्री |
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