अकृत्रिमप्रेमरसाभिरामं
रामार्पितं दृष्टिविलोभि दृष्टम् ।
मनःप्रसादाञ्जलिना निकामं
जग्राह पाथेयमिवेन्द्रसूनुः ॥
अकृत्रिमप्रेमरसाभिरामं
रामार्पितं दृष्टिविलोभि दृष्टम् ।
मनःप्रसादाञ्जलिना निकामं
जग्राह पाथेयमिवेन्द्रसूनुः ॥
रामार्पितं दृष्टिविलोभि दृष्टम् ।
मनःप्रसादाञ्जलिना निकामं
जग्राह पाथेयमिवेन्द्रसूनुः ॥
सारांश
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अर्जुन ने द्रौपदी के स्वाभाविक प्रेम और श्रद्धा से भरी उस दृष्टि को अपनी कठिन यात्रा के लिए पाथेय की तरह हृदय में संजो लिया।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अकृत्रिमेति ॥ इन्द्रसूनुरर्जुनः । क्रियया निवृत्तः कृत्रिमः ।
ड्वितः क्विः इति क्वित्रः। त्रेर्मन्नित्यम्इति मम्प्रत्ययः। तद्विरुद्धम् । प्रेमैव रसः। अकृत्रिमेण प्रेमरसेनाभिरामम् । अन्यत्र प्रेमरसेन मधुरादिना चाभिरामम् । रामया रमण्यार्पितम् । दृष्टिं विलोभयतीति दृष्टिविलोभि । दृष्टिप्रियमित्यर्थः । दृष्टं दर्शनम् ।नपुंसके भावे क्तः । मनःप्रसादः । प्रसन्नं मन इत्यर्थः । सोऽञ्जलिरिवेत्युपमितसमासः । तेन मनःप्रसादाञ्जलिना । पथि साधु पाथेयं शम्बलमिव । पथ्यतिथिवसतिस्वपतेर्ढञ् (अष्टाध्यायी ४.४.१०४ ) । निकाममतिशयेन जग्राह । रामार्पितं पाथेयं पथि क्षेमाय भवतीत्यागमः ॥
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | कृ | त्रि | म | प्रे | म | र | सा | भि | रा | मं |
| रा | मा | र्पि | तं | दृ | ष्टि | वि | लो | भि | दृ | ष्टम् |
| म | नः | प्र | सा | दा | ञ्ज | लि | ना | नि | का | मं |
| ज | ग्रा | ह | पा | थे | य | मि | वे | न्द्र | सू | नुः |
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