सारांश
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अमंगल के भय से अपने आँसुओं को रोकती हुई द्रौपदी, ओस से भीगे कमल जैसी अपनी आंखों को अर्जुन पर से हटाने में असमर्थ थी।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
तुषारेति ॥ सा द्रौपदी विलोकनेऽर्जुनावलोकनेऽगूढभावागूढाभिप्रायापि । स्फुटाभिलाषिणीति यावत् ।
भावो लीलाक्रियाचेष्टाभूत्यभिप्रायजन्तुषु इति वैजयन्ती। मङ्गलभङ्गर्भीरुर्मङ्गलहानेर्भीता सती । पर्यश्रुणी परिगताश्रुके । बाष्पावृते इत्यर्थः । अतएव तुषारलेखाकुलितोत्पलाभे हिमबिन्दुसहितेन्दीवरसंनिभे इत्युपमालंकारः । लोचने मीलयितुं न विषेहे न शशाक । अश्रुणोर्दृष्ट्यावरकत्वेऽपि तन्निपातस्थामङ्गलत्वात्तन्निर्वर्तकं निमीलनं सा न चकारेत्यर्थः ॥
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तु | षा | र | ले | खा | कु | लि | तो | त्प | ला | भे |
| प | र्य | श्रु | णी | म | ङ्ग | ल | भ | ङ्ग | भी | रुः |
| अ | गू | ढ | भा | वा | पि | वि | लो | क | ने | सा |
| न | लो | च | ने | मी | ल | यि | तुं | वि | षे | हे |
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