तान्भूरिधाम्नश्चतुरोऽपि दूरं
विहाय यामानिव वासरस्य ।
एकौघभूतं तदशर्म कृष्णां
विभावरीं ध्वान्तमिव प्रपेदे ॥
तान्भूरिधाम्नश्चतुरोऽपि दूरं
विहाय यामानिव वासरस्य ।
एकौघभूतं तदशर्म कृष्णां
विभावरीं ध्वान्तमिव प्रपेदे ॥
विहाय यामानिव वासरस्य ।
एकौघभूतं तदशर्म कृष्णां
विभावरीं ध्वान्तमिव प्रपेदे ॥
सारांश
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दिन के अंत में जैसे अंधकार पूरी रात को घेर लेता है, वैसे ही अर्जुन के वियोग का सारा दुख उन चारों भाइयों से होता हुआ द्रौपदी को प्राप्त हुआ।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
तानिति ॥ तत्पार्थीस्त्यक्तवच्छर्म सुखम् ।
शर्मशातसुखानि च इत्यमरः (अमरकोशः १.४.२६ ) । तद्विरुद्धमशर्म दुःखम् । नञ् (अष्टाध्यायी २.२.६ ) इति नञ्समासः। भूरिधाम्नोऽतितेजस्विन इति हानिहेतुत्वोक्तिः । चतुरस्तान्पार्थानपि वासरस्य भूरिधाम्नश्चतुरो यामान्प्रहरानिव । दूरं विहाय त्यक्त्वैकौघभूतमेकराशिभूतं सत्। श्रेण्यादयः कृतादिभिः (अष्टाध्यायी २.१.५९ ) इत्यर्थे कर्मधारयः। श्रेण्यादिराकृतिगणः इति शाकटायणः । कृष्णां विभावरीं कृष्णपक्षरात्रिं ध्वान्तमिव । कृष्णां द्रौपदीं प्रपेदे प्राप ॥
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ता | न्भू | रि | धा | म्न | श्च | तु | रो | ऽपि | दू | रं |
| वि | हा | य | या | मा | नि | व | वा | स | र | स्य |
| ए | कौ | घ | भू | तं | त | द | श | र्म | कृ | ष्णां |
| वि | भा | व | रीं | ध्वा | न्त | मि | व | प्र | पे | दे |
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