धैर्येण विश्वास्यतया महर्षे-
स्तीव्रादरातिप्रभवाच्च मन्योः ।
वीर्यं च विद्वत्सु सुते मघोनः
स तेषु न स्थानमवाप शोकः ॥
धैर्येण विश्वास्यतया महर्षे-
स्तीव्रादरातिप्रभवाच्च मन्योः ।
वीर्यं च विद्वत्सु सुते मघोनः
स तेषु न स्थानमवाप शोकः ॥
स्तीव्रादरातिप्रभवाच्च मन्योः ।
वीर्यं च विद्वत्सु सुते मघोनः
स तेषु न स्थानमवाप शोकः ॥
सारांश
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व्यास जी पर अटूट विश्वास और शत्रुओं के प्रति भारी क्रोध के बावजूद, भाइयों के मन में अर्जुन के बिछोह का दुख ठहर ही गया।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
धैर्येणेति ॥ धैर्येण तेषां निसर्गतो निर्विकारचित्तत्वेन तथा महर्षेर्व्यासस्य । प्रवर्तकस्येति शेषः । विश्वास्यतया । श्रद्धेयवचनत्वेनेत्यर्थः । अरातिप्रभवादरातिहेतुकात्तीव्राहुःसहान्मन्योः क्रोधाद्धेतोस्तथार्जुनप्रभावपरिज्ञानाच्चेति । हेत्वन्तरं विशेषणमुखेनाहमघोनः सुतेऽर्जुने वीर्यं च ।
न लोक— (अष्टाध्यायी २.३.६९ ) इत्यादिना षष्ठीप्रतिषेधः। विद्वत्सु ज्ञातवत्स्विति यावत् । विदेः शतुर्वसुः (अष्टाध्यायी ७.१.३६ ) इति वैकल्पिको वस्त्रादेशः। तेषु पार्थेषु स शोकः स्थानं स्थितिं नावाप न प्राप ॥
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| धै | र्ये | ण | वि | श्वा | स्य | त | या | म | ह | र्षे |
| स्ती | व्रा | द | रा | ति | प्र | भ | वा | च्च | म | न्योः |
| वी | र्यं | च | वि | द्व | त्सु | सु | ते | म | घो | नः |
| स | ते | षु | न | स्था | न | म | वा | प | शो | कः |
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