अथोष्णभासेव सुमेरुकुञ्जा-
न्विहीयमानानुदयाय तेन ।
बृहद्द्युतीन्दुःखकृतात्मलाभं
तमः शनैः पाण्डुसुतान्प्रपेदे ॥
अथोष्णभासेव सुमेरुकुञ्जा-
न्विहीयमानानुदयाय तेन ।
बृहद्द्युतीन्दुःखकृतात्मलाभं
तमः शनैः पाण्डुसुतान्प्रपेदे ॥
न्विहीयमानानुदयाय तेन ।
बृहद्द्युतीन्दुःखकृतात्मलाभं
तमः शनैः पाण्डुसुतान्प्रपेदे ॥
सारांश
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जैसे सूर्य के सुमेरु पर्वत से हटने पर अंधकार बढ़ता है, वैसे ही अर्जुन के जाने पर अन्य पांडव गहरे और असहनीय शोक में डूब गए।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अथेति ॥ अथोष्णभासा सूर्येणोदयाय पुनरुद्गमाय विहीयमानांस्त्यज्यमानानिति तमःप्राप्तिकारणोक्तिः। बृहद्द्युतीन्।सौवर्णत्वाद्दीप्यमानानित्यर्थः । इति तमसः संकोचकारणोक्तिः। सुमेरुकुञ्जानिव। अत्र सुमेरुग्रहणं कुञ्जानां सौवर्णत्वद्योतनार्थम् । तेनार्जुनेनोदयाय श्रेयसे विहीयमानान्बृहद्द्युतीननेकबुद्धिप्रकाशान् । पूर्ववद्विशेषणद्वयस्य प्रयोजनमनुसंधेयम् । पाण्डुसुतान् । चतुर इति शेषः । दुःखेन कृच्छ्रेण कृत उपपादित आत्मलाभ उत्पत्तिर्यस्य तत्तथोक्तम् । तेषां विवेकित्वात्कथंचिल्लब्धोदयमित्यर्थः । तमः शोकोऽन्धकारश्च ।
तमोऽन्धकारे स्वर्भानौ तमः शोके गुणान्तरे इत्युभयत्रापि विश्वः । शनैर्मन्दं प्रपेदे । तेषां विवेकित्वाद्भीतभीतमिवेति भावः । अत्र तमःशब्दस्य श्लिष्टत्वाच्छ्लेषानुप्राणितेयमुपमा ॥
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | थो | ष्ण | भा | से | व | सु | मे | रु | कु | ञ्जा |
| न्वि | ही | य | मा | ना | नु | द | या | य | ते | न |
| बृ | ह | द्द्यु | ती | न्दुः | ख | कृ | ता | त्म | ला | भं |
| त | मः | श | नैः | पा | ण्डु | सु | ता | न्प्र | पे | दे |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||
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