इति ब्रुवाणेन महेन्द्रसूनुं
महर्षिणा तेन तिरोबभूवे ।
तं राजराजानुचरोऽस्य साक्षा-
त्प्रदेशमादेशमिवाधितस्थौ ॥
इति ब्रुवाणेन महेन्द्रसूनुं
महर्षिणा तेन तिरोबभूवे ।
तं राजराजानुचरोऽस्य साक्षा-
त्प्रदेशमादेशमिवाधितस्थौ ॥
महर्षिणा तेन तिरोबभूवे ।
तं राजराजानुचरोऽस्य साक्षा-
त्प्रदेशमादेशमिवाधितस्थौ ॥
सारांश
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अर्जुन को यह निर्देश देकर महर्षि व्यास अंतर्ध्यान हो गए और कुबेर का वह सेवक (यक्ष) व्यास जी की आज्ञा का पालन करने हेतु उपस्थित हुआ।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
इतीति ॥ इतीत्थं महेन्द्रसूनुमर्जुनं ब्रुवाणेनोक्तवता ।
वर्तमानसामीप्ये (अष्टाध्यायी ३.३.१३१ ) इति भूते वर्तमानवत्प्रत्ययस्तिरोधानस्याविलम्बसूचनार्थः । तेन महर्षिणा व्यासेन तिरोबभूवेऽन्तर्दधे । भावे लिट् । राजराजो यक्षराजः । 'राजा प्रभौ नृपे चन्द्रे यक्षे क्षत्रियश क्रयोः' इति विश्वः । तस्यानुचरः पूर्वोक्तयक्षोऽस्य मुनेरादेशं साक्षादिध प्रदेशमर्जुनाधिष्ठितस्थानमधितष्ठौ । प्राप्त इत्यर्थः । स्थादिष्वभ्यासेन चाभ्यासस्य' इति षत्वम् ॥
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ति | ब्रु | वा | णे | न | म | हे | न्द्र | सू | नुं |
| म | ह | र्षि | णा | ते | न | ति | रो | ब | भू | वे |
| तं | रा | ज | रा | जा | नु | च | रो | ऽस्य | सा | क्षा |
| त्प्र | दे | श | मा | दे | श | मि | वा | धि | त | स्थौ |
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