करिष्यसे यत्र सुदुश्चराणि
प्रसत्तये गोत्रभिदस्तपांसि
शिलोच्चयं चारुशिलोच्चयं
तमेष क्षणान्नेष्यति गुह्यकस्त्व्-
आम्
करिष्यसे यत्र सुदुश्चराणि
प्रसत्तये गोत्रभिदस्तपांसि
शिलोच्चयं चारुशिलोच्चयं
तमेष क्षणान्नेष्यति गुह्यकस्त्व्-
आम्
प्रसत्तये गोत्रभिदस्तपांसि
शिलोच्चयं चारुशिलोच्चयं
तमेष क्षणान्नेष्यति गुह्यकस्त्व्-
आम्
सारांश
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जहाँ तुम इंद्र को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या करोगे, उस रमणीय पर्वत पर यह यक्ष तुम्हें पल भर में पहुँचा देगा।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
करिष्यस इति ॥ यत्र शिलोच्चये गोत्रभिद् इन्द्रस्य प्रसत्तये प्रसादाय सुदुश्चराणि तपांसि करिष्यसे । चारुशिलोच्चयं रम्यशिखरं तं शिलोच्चयं गिरिमिन्द्रकीलरूपम् ।
अद्रिगोत्रगिरिग्रावाचलशैलशिलोच्चयाः इत्यमरः (अमरकोशः २.३.१ ) । त्वामेष गुह्यको यक्षः। अनन्तरमेचास्य पुर:प्रादुर्भावादेम इति निर्देशः । क्षणानेष्यति प्रापयिष्यति ॥
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | रि | ष्य | से | य | त्र | सु | दु | श्च | रा | णि |
| प्र | स | त्त | ये | गो | त्र | भि | द | स्त | पां | सि |
| शि | लो | च्च | यं | चा | रु | शि | लो | च्च | यं | त |
| मे | ष | क्ष | णा | न्ने | ष्य | ति | गु | ह्य | क | स्त्वाम् |
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