सारांश
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इस योग से तेजस्वी बनकर, तुम अपनी शक्ति शत्रुओं को न देते हुए मुनियों की भांति नियमपूर्वक जप, उपवास और संध्या-वंदन आदि का पालन करो।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अनेनेति ॥ अनेन स्वोपदिष्टेन योगेन विवृद्धतेजा निजां पदवी परस्मा अयच्छन् । परस्य प्रवेशमयच्छन्नित्यर्थः । उपात्तशस्त्रो निगृहीतायुधः सन् । जपोपवासाभिषवैः स्वाध्यायानशनस्नानैर्मुनीनामाचारं समाचरानुतिष्ठ ॥ क्षेत्रविशेषे तपःसिद्धिरित्याशयेन तं निदर्शयन्नाह
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | ने | न | यो | गे | न | वि | वृ | द्ध | ते | जा |
| नि | जां | प | र | स्मै | प | द | वी | म | य | च्छन् |
| स | मा | च | रा | चा | र | मु | पा | त्त | श | स्त्रो |
| ज | पो | प | वा | सा | भि | ष | वै | र्मु | नी | नाम् |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||
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