सारांश
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अर्जुन की मुखाकृति को भारी सफलता के योग्य जानकर, व्यास जी ने उन्हें विजय प्राप्ति हेतु तपस्या में लगाने के लिए यह निर्देश दिया।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
आकारमिति ॥ आशंसित आख्यातो भूरिलाभोऽनेकश्रेयःप्राप्तिर्येन तं तथोक्तम् । महाभाग्यसूचकमित्यर्थः । अन्तःकरणशब्देन तद्वृत्तिरुत्साहो लक्ष्यते। तदनुरूपं तदनुकूलम् । उत्साहानुगुणव्यापारक्षममित्यर्थः । आकारं मूर्तिं दधानं तमर्जुनं मुनिर्विजयोदये विजयफलके तप:समाधौ तपोनियमे ।
समाधिनियमे ध्याने नीवाके च समर्थने इति विश्वः । नियोजयिष्यन् । नियोजयितुमिच्छन्नित्यर्थः । लट् शेषे च इति लट् । लृटः सद्वा इति सत्प्रत्ययः (अष्टाध्यायी ३.१.१ ) । इति वक्ष्यमाणमुवाच ॥
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | का | र | मा | शं | सि | त | भू | रि | ला | भं |
| द | धा | न | म | न्तः | क | र | णा | नु | रू | पम् |
| नि | यो | ज | यि | ष्य | न्वि | ज | यो | द | ये | तं |
| त | पः | स | मा | धौ | मु | नि | रि | त्यु | वा | च |
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