योगं च तं योग्यतमाय तस्मै
तपःप्रभावाद्विततार सद्यः ।
येनास्य तत्त्वेषु कृतेऽवभासे
समुन्मिमीलेव चिराय चक्षुः ॥
योगं च तं योग्यतमाय तस्मै
तपःप्रभावाद्विततार सद्यः ।
येनास्य तत्त्वेषु कृतेऽवभासे
समुन्मिमीलेव चिराय चक्षुः ॥
तपःप्रभावाद्विततार सद्यः ।
येनास्य तत्त्वेषु कृतेऽवभासे
समुन्मिमीलेव चिराय चक्षुः ॥
सारांश
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मुनि ने वह श्रेष्ठ योग सुपात्र अर्जुन को प्रदान किया, जिससे अर्जुन को सत्य का बोध हुआ और उनकी ज्ञानरूपी आँखें सदैव के लिए खुल गईं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
योगं चेति ॥ योग्यतमायार्हतमाय तस्मै पार्थाय तं वक्ष्यमाणमहिमानं योगं ध्यानविधिं च ।
योगः संनहनोपायध्यानसंगतियुक्तिषु इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.२८ ) । तपःप्रभावात्सद्यो विततार ददौ । चिरकालग्राह्यमपीति भावः । येन योगेन तत्त्वेषु प्रकृतिमहदादिषु । तथा च । मूलप्रकृतिर्महानहंकारो मनश्च पञ्च तन्मात्राणि पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि पश्च कर्मेन्द्रियाणि पञ्च महाभूतानीति चतुर्विंशति तत्त्वानि । तत्रावभासे साक्षात्कारे कृते सत्यस्यार्जुनस्य चक्षुरक्षि चिराय समुन्मिमीलेवोन्मिषितमिवेत्युत्प्रेक्षा। तदा तस्य कोऽपि महानखिलाज्ञानभञ्जनस्तत्त्वावभासश्चिरादन्धस्य दृष्टिलाभ इवाभवदिति भावः ॥
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यो | गं | च | तं | यो | ग्य | त | मा | य | त | स्मै |
| त | पः | प्र | भा | वा | द्वि | त | ता | र | स | द्यः |
| ये | ना | स्य | त | त्त्वे | षु | कृ | ते | ऽव | भा | से |
| स | मु | न्मि | मी | ले | व | चि | रा | य | च | क्षुः |
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