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निर्याय विद्याथ दिनादिरम्या-
द्बिम्बादिवार्कस्य मुखान्महर्षेः ।
पार्थाननं वह्निकणावदाता
दीप्तिः स्फुरत्पद्ममिवाभिपेदे ॥

सारांश AI महर्षि के मुख से वह तेजस्वी विद्या निकलकर अर्जुन के मुख में वैसे ही समा गई, जैसे सूर्यमंडल से निकलकर किरणें खिलते हुए कमल पर गिरती हैं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः) निर्यायेति ॥ अथ वह्निकणावदाता स्फुलिङ्गवदुज्ज्वला । देवतासान्निध्यादिति भावः । विद्येन्द्रमन्त्ररूपा । दिनादिरम्यादर्कस्य प्रभातभास्करस्य बिम्बादिव महर्षेर्व्यासस्य मुखान्निर्याय निर्गत्य । समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप् । दीप्तिरर्कदीधितिः । स्फुरद्विकसत्पद्ममिव । पार्थाननमर्जुनस्य मुखमभिपेदे प्रविष्टा ॥
छन्दः इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
नि र्या वि द्या दि ना दि म्या
द्बि म्बा दि वा र्क स्य मु खा न्म र्षेः
पा र्था नं ह्नि णा दा ता
दी प्तिः स्फु त्प द्म मि वा भि पे दे
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