इत्युक्तवन्तं व्रज साधयेति
प्रमाणयन्वाक्यमजातशत्रोः ।
प्रसेदिवांसं तमुपाससाद
वसन्निवान्ते विनयेन जिष्णुः ॥
इत्युक्तवन्तं व्रज साधयेति
प्रमाणयन्वाक्यमजातशत्रोः ।
प्रसेदिवांसं तमुपाससाद
वसन्निवान्ते विनयेन जिष्णुः ॥
प्रमाणयन्वाक्यमजातशत्रोः ।
प्रसेदिवांसं तमुपाससाद
वसन्निवान्ते विनयेन जिष्णुः ॥
सारांश
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युधिष्ठिर की आज्ञा पाकर, अर्जुन ने महर्षि व्यास के वचनों को शिरोधार्य किया और अत्यंत विनय के साथ प्रसन्नचित्त मुनि के समीप गए।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
इतीति ॥ इत्युक्तवन्तं प्रसेदिवांसं प्रसन्नम् ।
भाषायां सदवसश्रुवः (अष्टाध्यायी ३.२.१०८ ) इति क्वसुः। तं मुनि जिष्णुर्जयनशीलोऽर्जुनः । ग्लाजिस्थश्च- (अष्टाध्यायी ३.२.१३९ ) इति ग्स्नुप्रत्ययः । ब्रज साधयानुतिष्ठेत्येवंरूपम् । अजातशत्रोधर्मराजस्य । स्वयमविद्वेषणशीलत्वादियं संज्ञा । वाक्यं प्रमाणयन् । तदादिष्टः सन्नित्यर्थः । अन्ते वसंश्छात्र इव । छात्रान्तेवासिनौ शिष्ये इत्यमरः (अमरकोशः २.७.१३ ) । विनयेनानौद्धत्येनोपाससाद समीपं प्राप ॥
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | त्यु | क्त | व | न्तं | व्र | ज | सा | ध | ये | ति |
| प्र | मा | ण | य | न्वा | क्य | म | जा | त | श | त्रोः |
| प्र | से | दि | वां | सं | त | मु | पा | स | सा | द |
| व | स | न्नि | वा | न्ते | वि | न | ये | न | जि | ष्णुः |
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