महत्त्वयोगाय महामहिम्ना-
माराधनीं तां नृप देवतानाम् ।
दातुं प्रदानोचित भूरिधाम्नी-
मुपागतः सिद्धिमिवास्मि विद्याम् ॥
महत्त्वयोगाय महामहिम्ना-
माराधनीं तां नृप देवतानाम् ।
दातुं प्रदानोचित भूरिधाम्नी-
मुपागतः सिद्धिमिवास्मि विद्याम् ॥
माराधनीं तां नृप देवतानाम् ।
दातुं प्रदानोचित भूरिधाम्नी-
मुपागतः सिद्धिमिवास्मि विद्याम् ॥
सारांश
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हे राजन, ऐश्वर्य की वृद्धि के लिए और देवताओं की आराधना हेतु, मैं आपको यह तेजपुंज 'सिद्धि' के समान विद्या प्रदान करने आया हूँ।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
महत्त्वेति ॥ हे नृप, महत्त्वयोगाय प्रकर्षलाभाय महामहिम्नां महानुभावानां देवतानामिन्द्रादीनाम्। आराध्यतेऽनयेत्याराधनी ताम् । प्रसादयित्रीमित्यर्थः । करणे ल्युट् । ङीप् । भूरिधाम्नीं महाप्रभावाम् ।
धाम देशे गृहे रश्मौ स्थाने जन्मप्रभावयोः इति विश्वः । अन उपधालोपिनोऽन्यतरस्याम् इति वा ङीप् । विद्यामिन्द्रमन्त्ररूपां सिद्धिं साक्षात्कार्यसिद्धिमिवेति विद्याया अमोघत्वोक्तिः। हे प्रदानोचित दानपात्रभूत । फलभोक्तृत्वादस्य पात्रत्वोक्तिः। दातुमुपागतोऽस्मि ॥ इत्युक्तवन्तं ब्रज साधयेति प्रमाणयन्वाक्यमजातशत्रोः । प्रसेदिवांसं तमुपाससाद वसन्निवान्ते विनयेन जिष्णुः
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | ह | त्त्व | यो | गा | य | म | हा | म | हि | म्ना |
| मा | रा | ध | नीं | तां | नृ | प | दे | व | ता | नाम् |
| दा | तुं | प्र | दा | नो | चि | त | भू | रि | धा | म्नी |
| मु | पा | ग | तः | सि | द्धि | मि | वा | स्मि | वि | द्याम् |
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