सारांश
AI
इस विद्या के माध्यम से कठिन तपस्या करके अर्जुन वह अजेय शक्ति प्राप्त करेंगे, जिससे वे शत्रुओं का समूल नाश करने में सक्षम होंगे।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
ययेति ॥ यया विद्यया करणेन सुदुश्चरामतिदुष्करां तपस्यां तपश्चर्याम् ।
कर्मणो रोमन्थतपोभ्यां वर्तिचरोः (अष्टाध्यायी ३.१.१५ ) इति क्यङ् । अ प्रत्ययात् (अष्टाध्यायी ३.३.१०२ ) इति स्त्रियामप्रत्ययः। आचरता । पशुपतिं प्रति तपः कुर्वतेत्यर्थः । अतएव समासादितं प्राप्तं साधनं पाशुपतास्त्ररूपं येन तेन । कपिर्हनुमान्केतनं चिह्नं यस्य तेन । अर्जुनेनेत्यर्थः । दुरापमन्यस्य दुर्लभं वीर्यं तेजः समवाप्य । एते पूर्वोक्ता भीष्मादय उन्मूलितार उन्मूलयिष्यन्ते । उन्मूलयतेर्ण्यन्तात्कर्मणि लुट् । अत्र चिण्वदिडागमेऽपि तस्य असिद्धवदत्राभात् (अष्टाध्यायी ६.४.२२ ) इत्यसिद्धत्वात् णेरनिटि (अष्टाध्यायी ६.४.५१ ) इति णिलोपः । तन्निमित्तस्यैव अर्निटि' इति निषेधात् । उक्तं च-'चिण्वद्वृद्धिर्युक्च हन्तेश्च धत्वं दीर्घश्चोक्तो यो मितां वा चिणीति । इट् चासिद्धस्तेन मे लुप्यते णिर्नित्यश्चायं वल्निमित्तो विघाती ॥' इति ॥
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | या | स | मा | सा | दि | त | सा | ध | ने | न |
| सु | दु | श्च | रा | मा | च | र | ता | त | प | स्याम् |
| ए | ते | दु | रा | पं | स | म | वा | प्य | वी | र्य |
| मु | न्मी | लि | ता | रः | क | पि | के | त | ने | न |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.