जहातु नैनं कथमर्थसिद्धिः
संशय्य कर्णादिषु तिष्ठते यः ।
असाद्युयोगा हि जयान्तरायाः
प्रमाथिनीनां विपदां पदानि ॥
जहातु नैनं कथमर्थसिद्धिः
संशय्य कर्णादिषु तिष्ठते यः ।
असाद्युयोगा हि जयान्तरायाः
प्रमाथिनीनां विपदां पदानि ॥
संशय्य कर्णादिषु तिष्ठते यः ।
असाद्युयोगा हि जयान्तरायाः
प्रमाथिनीनां विपदां पदानि ॥
अन्वयः
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यः कर्ण-आदिषु संशय्य तिष्ठते, एनम् अर्थ-सिद्धिः कथं न जहातु? हि असाधु-योगाः जय-अन्तरायाः प्रमाथिनीनाम् विपदाम् पदानि (भवन्ति) ।
English Summary
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How can success not abandon him (Duryodhana), who relies on Karna and others of doubtful character? Indeed, alliances with the wicked are obstacles to victory and the very source of tormenting calamities.
सारांश
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सफलता उस व्यक्ति को क्यों नहीं मिलेगी जो कर्ण जैसे शत्रुओं की शक्ति पर सन्देह करता है? दुष्टों का साथ विजय में बाधक होता है और विनाशकारी विपत्तियों का मार्ग प्रशस्त करता है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
जहात्विति ॥ एनं धृतराष्ट्रमर्थसिद्धिः कथं न जहातु । जहात्वेवेत्यर्थः ।
प्रैषातिसर्गप्राप्तकालेषु कृत्याश्च (अष्टाध्यायी ३.३.१६३ ) इति प्राप्तकाले लोट् । तस्य हानिकालः प्राप्त इत्यर्थः । कुतः। बो धृतराष्ट्रः संशय्य संदिह्य कर्णादिषु तिष्ठते । कर्णादीन्दुर्मन्त्रिणः संदिग्धाथै निर्णेतृत्वेनावलम्बत इत्यर्थः । प्रकाशनस्थेयाख्ययोश्च (अष्टाध्यायी १.३.२३ ) इति स्थेयाख्यायामात्मनेपदम् । तिष्ठतेऽस्मिन्निति स्थेयो विवादपदनिर्णेता । तथाहि । असाधुयोगा दुर्जनसंसर्गा जयान्तराया जयविघातकाः। किं च प्रमाथिनीनामुन्मूलनशीलानां विपदां पदानि स्थानानि । पदं व्यवसितत्राणस्थानलक्ष्माङ्घ्रिवस्तुषु इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.१०१ ) । न केवलं जयघातिनः किंत्वनर्थकारिणश्चेत्यर्थः । धृतराष्ट्रोऽपि दुर्जनविधेयत्वाद्द्विनङ्क्ष्यतीति भावः ॥ एवं शत्रोरनर्थं सूचयित्वा राज्ञोऽर्थसिद्धिं सूचयति
पदच्छेदः
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| जहातु | जहातु (√हा कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let it abandon |
| न | न | not |
| एनम् | इदम् (२.१) | him |
| कथम् | कथम् | how |
| अर्थसिद्धिः | अर्थ–सिद्धि (१.१) | success |
| संशय्य | संशय्य (सम्√शी+ल्यप्) | having placed reliance on |
| कर्णादिषु | कर्ण–आदि (७.३) | on Karna and others |
| तिष्ठते | तिष्ठते (√स्था कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | relies |
| यः | यद् (१.१) | he who |
| असाद्युयोगाः | असाधु–योग (१.३) | alliances with the wicked |
| हि | हि | for indeed |
| जयान्तरायाः | जय–अन्तराय (१.३) | obstacles to victory |
| प्रमाथिनीनाम् | प्रमाथिनी (प्र√मन्थ्+णिनि, ६.३) | of tormenting |
| विपदाम् | विपद् (६.३) | of calamities |
| पदानि | पद (१.३) | the abodes |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ज | हा | तु | नै | नं | क | थ | म | र्थ | सि | द्धिः |
| सं | श | य्य | क | र्णा | दि | षु | ति | ष्ठ | ते | यः |
| अ | सा | द्यु | यो | गा | हि | ज | या | न्त | रा | याः |
| प्र | मा | थि | नी | नां | वि | प | दां | प | दा | नि |
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