ततः शरच्चन्द्रकराभिरामै-
रुत्सर्पिभिः प्रांशुमिवांशुजालैः ।
बिभ्राणमानीलरुचं पिशङ्गी-
र्जटास्तडित्वन्तमिवाम्बुवाहम् ॥
ततः शरच्चन्द्रकराभिरामै-
रुत्सर्पिभिः प्रांशुमिवांशुजालैः ।
बिभ्राणमानीलरुचं पिशङ्गी-
र्जटास्तडित्वन्तमिवाम्बुवाहम् ॥
रुत्सर्पिभिः प्रांशुमिवांशुजालैः ।
बिभ्राणमानीलरुचं पिशङ्गी-
र्जटास्तडित्वन्तमिवाम्बुवाहम् ॥
अन्वयः
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ततः शरत्-चन्द्र-कर-अभिरामैः उत्सर्पिभिः अंशुजालैः प्रांशुम् इव, आनीलरुचम् पिशङ्गीः जटाः बिभ्राणम्, तडित्वन्तम् अम्बुवाहम् इव (स्थितं मुनिम् आबभाषे) ।
English Summary
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Then (Yudhishthira addressed the sage), who, with his spreading net of rays lovely as those of the autumn moon, seemed tall; who bore tawny matted locks of a slightly dark lustre, resembling a cloud charged with lightning.
सारांश
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इसके बाद शरद ऋतु के चन्द्रमा की किरणों के समान मनोहर और ऊपर की ओर उठती हुई अपनी देह-कान्ति से सुशोभित, सजल मेघ के समान श्यामवर्ण और बिजली के समान चमकती हुई पीली जटाओं वाले व्यास मुनि वहाँ प्रकट हुए।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अथ त्रिभिर्मुनिं विशिषंश्चतुर्भिः कलापकमाह- तदुक्तम्-
द्वाभ्यां युग्ममिति प्रोक्तं त्रिभिः श्लोकैर्विशेषकम् । कलापकं चतुर्भिः स्यात्तदूर्ध्वं कुलकं स्मृतम् ॥इति- तत इति ॥ तत उपवेशानन्तरं धर्मात्मजो युधिष्ठिरः शरच्चन्द्रकराभिरामैः आह्लादकैरित्यर्थः । उत्सर्पिभिरूर्ध्वं प्रसारिभिरंशुजालैः प्रांशुमुन्नतमिव स्थितमित्युत्प्रेक्षा । पुनरानीलरुचं कृष्णवर्णं पिशङ्गीः पिङ्गलवर्णाः । गौरादित्वान्ङीप् । जटा बिभ्राणं धारयन्तमतएव तडित्वन्तं विद्युद्युक्तमम्बुवाहमिव स्थितमित्युत्प्रेक्षा ॥
पदच्छेदः
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| ततः | ततः | Then |
| शरच्चन्द्रकराभिरामैः | शरद्–चन्द्र–कर–अभिराम (३.३) | by (rays) lovely as the rays of the autumn moon |
| उत्सर्पिभिः | उत्सर्पिन् (उद्√सृप्+इन्, ३.३) | by the spreading |
| प्रांशुम् | प्रांशु (२.१) | tall |
| इव | इव | as if |
| अंशुजालैः | अंशु–जाल (३.३) | by the net of rays |
| बिभ्राणम् | बिभ्राण (√भृ+शानच्, २.१) | bearing |
| आनीलरुचम् | आनीलरुच् (२.१) | having a slightly dark lustre |
| पिशङ्गीः | पिशङ्ग (२.३) | tawny |
| जटाः | जटा (२.३) | matted locks |
| तडित्वन्तम् | तडित्वत् (२.१) | possessing lightning |
| इव | इव | like |
| अम्बुवाहम् | अम्बु–वाह (२.१) | a cloud |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | तः | श | र | च्च | न्द्र | क | रा | भि | रा | मै |
| रु | त्स | र्पि | भिः | प्रां | शु | मि | वां | शु | जा | लैः |
| बि | भ्रा | ण | मा | नी | ल | रु | चं | पि | श | ङ्गी |
| र्ज | टा | स्त | डि | त्व | न्त | मि | वा | म्बु | वा | हम् |
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