अन्वयः
AI
सहसा उपगतः, तपसां सूतिः, एनसाम् असूतिः, वपुष्मान् पुण्यसंचयः इव सः मुनिः जगतीभुजा सविस्मयम् ददृशे ।
English Summary
AI
Suddenly, the king (Yudhishthira) saw with astonishment that sage who had approached. The sage, a source of austerities and an ender of sins, appeared like an embodied accumulation of merit.
सारांश
AI
अचानक आए हुए तप के अक्षय भंडार और पापों के नाशक उन मुनि को राजा युधिष्ठिर ने साक्षात् शरीरधारी पुण्य-पुंज के समान विस्मय के साथ देखा।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
सहसेति ॥ पुनः सहसोपगतोऽकस्मादागतस्तपसां सूतिः प्रभव आपदामसूतिरप्रभवः । निवर्तक इति यावत् । स मुनिर्व्यासो वपुष्मान्देहधारी पुण्यसंचयः पुण्यराशिरिवेत्युत्प्रेक्षा । जगतीभुजा राज्ञा सविस्मयं ददृशे दृष्टः ॥
पदच्छेदः
AI
| सहसा | सहसा | suddenly |
| उपगतः | उपगत (उप√गम्+क्त, १.१) | approached |
| सविस्मयम् | सविस्मयम् | with astonishment |
| तपसाम् | तपस् (६.३) | of austerities |
| सूतिः | सूति (√सू+क्तिन्, १.१) | the origin |
| असूतिः | असूति (१.१) | the non-origin/ender |
| एनसाम् | एनस् (६.३) | of sins |
| ददृशे | ददृशे (√दृश् भावकर्मणोः लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was seen |
| जगतीभुजा | जगतीभुज् (३.१) | by the king |
| मुनिः | मुनि (१.१) | the sage |
| सः | तद् (१.१) | that |
| वपुष्मान् | वपुष्मत् (१.१) | embodied |
| इव | इव | like |
| पुण्यसंचयः | पुण्य–संचय (१.१) | an accumulation of merit |
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | ह | सो | प | ग | तः | स | वि | स्म | यं | |
| त | प | सां | सू | ति | र | सू | ति | रे | न | साम् |
| द | दृ | शे | ज | ग | ती | भु | जा | मु | निः | |
| स | व | पु | ष्मा | नि | व | पु | ण्य | सं | च | यः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.