उन्मज्जन्मकर इवामारापगाया
वेगेन प्रतिमुखमेत्य बाणनद्याः ।
गाण्डीवी कनकशिलानिभं भुजाभ्या-
माजघ्ने विषमविलोचनस्य वक्षः ॥
उन्मज्जन्मकर इवामारापगाया
वेगेन प्रतिमुखमेत्य बाणनद्याः ।
गाण्डीवी कनकशिलानिभं भुजाभ्या-
माजघ्ने विषमविलोचनस्य वक्षः ॥
वेगेन प्रतिमुखमेत्य बाणनद्याः ।
गाण्डीवी कनकशिलानिभं भुजाभ्या-
माजघ्ने विषमविलोचनस्य वक्षः ॥
अन्वयः
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गाण्डीवी, अमारापगायाः उन्मज्जत्-मकरः इव, वेगेन बाण-नद्याः प्रतिमुखम् एत्य, भुजाभ्याम् विषम-विलोचनस्य कनक-शिला-निभम् वक्षः आजघ्ने।
English Summary
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The wielder of Gandiva (Arjuna), like a crocodile emerging from the river of the gods (Ganges), swiftly advanced against the river of arrows and struck the gold-rock-like chest of the odd-eyed one (Shiva) with both his arms.
सारांश
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गंगा से निकलते मगरमच्छ की भांति, बाणों की धारा के विपरीत जाकर अर्जुन ने अपनी भुजाओं से शिव के स्वर्णशिला सदृश वक्षस्थल पर प्रहार किया।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
उन्मज्जन्निति ॥ गाण्डीव्यर्जुन उन्मज्जन्नुत्तरन्मकरो जलग्राहविशेषोऽमरापगाया गङ्गाया इव बाणनद्या बाणप्रवाहाद्वेगेन प्रतिमुखमभिमुखमेत्यागत्य कनकशिलानिभम् । कनकग्रहणं काठिन्यातिशयद्योतनार्थम् । विषमविलोचनस्य त्र्यम्बकस्य वक्षो हृदयं भुजाभ्यामाजघ्ने ताडितवान् । अत्रात्मनेपदं विचार्यम् ।
आङो यमहनः (अष्टाध्यायी १.३.२८ ) इत्यत्राकर्मकाधिकारात् स्वाङ्गकर्मकाच्च इति वक्तव्यत्वात् । न च शिवस्य प्रतिमुखमित्यन्वयात्कनकशिलानिभं कनकनिकष्रतुल्यं श्यामं स्ववक्ष आजघ्न इत्यर्थ इतिवाच्यमनौचित्याचरणात् । न हि युद्धाय संनद्धा निपुणा अपि मल्लाः स्ववक्षस्ताडनमाचरन्ति । किं तु स्वभुजास्फालनम् । किं च । अनन्तरं वक्ष्यमाणभवकर्तृकाविनयसहनविरोधाद्वक्ष एवेत्यन्वयस्याव्यवधानाच्च पूर्वैरेव दूषितत्वात् । अतो व्याकरणान्तराद्द्रष्टव्यम् । केचित्तु त्र्यम्बकस्य वक्षः प्राप्य इत्यध्याहारं स्वीकृत्याकर्मकत्वादात्मनेपदमाहुः ॥
पदच्छेदः
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| उन्मज्जन्मकरः | उन्मज्जत् (उद्√मस्ज्+शतृ)–मकर (१.१) | an emerging crocodile |
| इव | इव | like |
| अमारापगायाः | अमार–आपगा (६.१) | of the river of the gods (Ganges) |
| वेगेन | वेग (३.१) | swiftly |
| प्रतिमुखम् | प्रतिमुखम् | against |
| एत्य | एत्य (आ√इ+ल्यप्) | having advanced |
| बाणनद्याः | बाण–नदी (६.१) | of the river of arrows |
| गाण्डीवी | गाण्डीविन् (१.१) | the wielder of Gandiva (Arjuna) |
| कनकशिलानिभम् | कनक–शिला–निभ (२.१) | like a golden rock |
| भुजाभ्याम् | भुज (३.२) | with his two arms |
| आजघ्ने | आजघ्ने (आ√हन् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | struck |
| विषमविलोचनस्य | विषम–विलोचन (६.१) | of the odd-eyed one (Shiva) |
| वक्षः | वक्षस् (२.१) | the chest |
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | न्म | ज्ज | न्म | क | र | इ | वा | मा | रा | प | गा | या |
| वे | गे | न | प्र | ति | मु | ख | मे | त्य | बा | ण | न | द्याः |
| गा | ण्डी | वी | क | न | क | शि | ला | नि | भं | भु | जा | भ्या |
| मा | ज | घ्ने | वि | ष | म | वि | लो | च | न | स्य | व | क्षः |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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