स खण्डनं प्राप्य परादमर्षवा-
न्भुजद्वितीयोऽपि विजेतुमिच्छया ।
ससर्ज वृष्टिं परिरुग्णपादपां
द्रवेतरेषां पयसामिवाश्मनाम् ॥
स खण्डनं प्राप्य परादमर्षवा-
न्भुजद्वितीयोऽपि विजेतुमिच्छया ।
ससर्ज वृष्टिं परिरुग्णपादपां
द्रवेतरेषां पयसामिवाश्मनाम् ॥
न्भुजद्वितीयोऽपि विजेतुमिच्छया ।
ससर्ज वृष्टिं परिरुग्णपादपां
द्रवेतरेषां पयसामिवाश्मनाम् ॥
अन्वयः
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परात् खण्डनम् प्राप्य अमर्षवान् सः (अर्जुनः) भुज-द्वितीयः अपि विजेतुम् इच्छया, परि-रुग्ण-पादपाम् अश्मनाम् वृष्टिम्, द्रव-इतरेषाम् पयसाम् (वृष्टिम्) इव, ससर्ज।
English Summary
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Having suffered defeat from his opponent, the indignant Arjuna, though having only his arms as his second weapon, desired to win and unleashed a shower of rocks that shattered trees, like a shower of things other than liquid water (i.e., hail).
सारांश
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शत्रु द्वारा शस्त्रहीन किए जाने पर भी अत्यंत क्रोधित अर्जुन ने केवल अपनी भुजाओं के बल से वृक्षों और पत्थरों की वैसी ही वर्षा की जैसे बादलों से ओलों की वृष्टि होती है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
स इति॥परात्परस्माच्छत्रो:।
पूर्वादिभ्यो नवभ्यो वा (अष्टाध्यायी ७.१.१६ ) इति विकल्पान्न स्मादादेशः। खण्डनं अङ्गं प्राप्यामर्षवान्सोऽर्जुनो भुजद्वितीयो भुजमात्रसहायः सन्नपि विजेतुमिच्छया द्रवेभ्य इतराणि तेषां द्रवेतरेषां कठिनानां पयसामिव । करकाणामिवेत्यर्थः। अश्मनां संबन्धिनीं परिरुग्णा भग्ना: पादपा यया सा तां वृष्टिं ससर्ज । अश्मभिर्जघानेत्यर्थः ॥ नीरन्ध्रं परिगमितें क्षयं पृषत्कैर्भूतानामधिपतिना शिलाविताने । उच्छ्रायस्थगितनभोदिगन्तरालं चिक्षेप क्षितिरुहजालमिन्द्रसूनुः
पदच्छेदः
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| सः | तद् (१.१) | He |
| खण्डनम् | खण्डन (२.१) | defeat |
| प्राप्य | प्राप्य (प्र√आप्+ल्यप्) | having received |
| परात् | पर (५.१) | from the opponent |
| अमर्षवान् | अमर्षवत् (१.१) | indignant |
| भुजद्वितीयः | भुज–द्वितीय (१.१) | having his arms as his second (weapon) |
| अपि | अपि | even |
| विजेतुम् | विजेतुम् (वि√जि+तुमुन्) | to win |
| इच्छया | इच्छा (३.१) | with the desire |
| ससर्ज | ससर्ज (√सृज् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | unleashed |
| वृष्टिम् | वृष्टि (२.१) | a shower |
| परिरुग्णपादपाम् | परिरुग्ण (परि√रुज्+क्त)–पादप (२.१) | which shattered trees |
| द्रवेतरेषाम् | द्रव–इतर (६.३) | of things other than liquid |
| पयसाम् | पयस् (६.३) | of waters |
| इव | इव | like |
| अश्मनाम् | अश्मन् (६.३) | of rocks |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | ख | ण्ड | नं | प्रा | प्य | प | रा | द | म | र्ष | वा |
| न्भु | ज | द्वि | ती | यो | ऽपि | वि | जे | तु | मि | च्छ | या |
| स | स | र्ज | वृ | ष्टिं | प | रि | रु | ग्ण | पा | द | पां |
| द्र | वे | त | रे | षां | प | य | सा | मि | वा | श्म | नाम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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