संस्कारवत्त्वाद्रमयत्सु चेतः
प्रयोगशिक्षागुणभूषणेषु ।
जयं यथार्थेषु शरेषु पार्थः
शब्देषु भावार्थमिवाशशंसे ॥
संस्कारवत्त्वाद्रमयत्सु चेतः
प्रयोगशिक्षागुणभूषणेषु ।
जयं यथार्थेषु शरेषु पार्थः
शब्देषु भावार्थमिवाशशंसे ॥
प्रयोगशिक्षागुणभूषणेषु ।
जयं यथार्थेषु शरेषु पार्थः
शब्देषु भावार्थमिवाशशंसे ॥
अन्वयः
AI
पार्थः संस्कारवत्त्वात्, प्रयोगशिक्षागुणभूषणेषु, चेतः रमयत्सु, यथार्थेषु शरेषु, शब्देषु भावार्थम् इव, जयम् आशशंसे।
English Summary
AI
Partha (Arjuna) hoped for victory from his unerring arrows—which were refined, adorned with the qualities of practice and skill, and pleasing to the mind—just as a poet hopes for the intended meaning to emerge from well-crafted words.
सारांश
AI
व्याकरण से शुद्ध शब्दों में जैसे अर्थ की कामना की जाती है, वैसे ही प्रयोग और शिक्षा के गुणों से सुशोभित तथा मन को प्रसन्न करने वाले अपने अचूक बाणों से अर्जुन ने विजय की आशा की।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
संस्कारेति ॥ एवंभूतः पार्थः संस्कारवत्त्वात्संस्कारश्चित्तवासना। अन्यत्र साधुत्वम्। असाधूनां प्रयोगनिषेधादिति भावः । अथवा संस्कारो व्युत्पत्तिस्तद्वत्त्वात् । चेतो रमयत्सु । प्रयोगः संधानमोक्षादिः शिक्षाभ्यासो गुणस्तदाहितोऽतिशयो मौर्वी वा । अन्यत्र तु प्रयोगोऽभियुक्तव्यवहारः शिक्षाभ्यासो गुणाः स्वस्वस्थानकरणादयः श्लेषप्रसादादयो वा। ते भूषणं येषां तेषु यथा यथाभूता अर्था येषां तेषु यथार्थेषु । अन्यत्र नियतार्थेषु । शृण्वन्ति हिंसन्तीति शरास्तेषु जयम्। तन्निर्वाहकत्वात्तदाधारत्वविवक्षायां सप्तमी। शब्देषु पदेषु भावः प्रवृत्तिनिमित्तं सामान्यादिः स एवार्थस्तमिव । आशशंस आचकाङ्क्षे । शास्तिशंसत्योराङ्पूर्वयोरिच्छायामात्मनेपदमुपसंख्यानात् । यथा शाब्दिकाः शब्दैरर्थं साधयन्ति तद्वदयं शरैर्जयं साधयितुमियेषेत्यर्थः ॥
पदच्छेदः
AI
| संस्कारवत्त्वात् | संस्कारवत्–त्व (५.१) | due to their refinement |
| रमयत्सु | रमयत् (√रम्+णिच्+शतृ, ७.३) | in those that delight |
| चेतः | चेतस् (२.१) | the mind |
| प्रयोगशिक्षागुणभूषणेषु | प्रयोग–शिक्षा–गुण–भूषण (७.३) | in those adorned with the qualities of practice and skill |
| जयं | जय (२.१) | victory |
| यथार्थेषु | यथार्थ (७.३) | in the unerring |
| शरेषु | शर (७.३) | arrows |
| पार्थः | पार्थ (१.१) | Partha (Arjuna) |
| शब्देषु | शब्द (७.३) | from words |
| भावार्थमिव | भाव–अर्थम् (२.१)–इव | like the intended meaning |
| आशशंसे | आशशंसे (आ√शंस् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | hoped for |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सं | स्का | र | व | त्त्वा | द्र | म | य | त्सु | चे | तः |
| प्र | यो | ग | शि | क्षा | गु | ण | भू | ष | णे | षु |
| ज | यं | य | था | र्थे | षु | श | रे | षु | पा | र्थः |
| श | ब्दे | षु | भा | वा | र्थ | मि | वा | श | शं | से |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.