च्युते स तस्मिन्निषुधौ शरार्था-
द्ध्वस्तार्थसारे सहसेव बन्धौ ।
तत्कालमोघप्रणयः प्रपेदे
निर्वाच्यताकाम इवाभिमुख्यम् ॥
च्युते स तस्मिन्निषुधौ शरार्था-
द्ध्वस्तार्थसारे सहसेव बन्धौ ।
तत्कालमोघप्रणयः प्रपेदे
निर्वाच्यताकाम इवाभिमुख्यम् ॥
द्ध्वस्तार्थसारे सहसेव बन्धौ ।
तत्कालमोघप्रणयः प्रपेदे
निर्वाच्यताकाम इवाभिमुख्यम् ॥
अन्वयः
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शरार्थात् च्युते, ध्वस्तार्थसारे तस्मिन् इषुधौ, सहसा बन्धौ इव, (च्युते सति) सः तत्कालमोघप्रणयः (सन्) निर्वाच्यताकामः इव आभिमुख्यम् प्रपेदे ।
English Summary
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When that quiver failed its purpose of providing arrows, its essence destroyed, like a kinsman failing suddenly, he (Arjuna), whose request (for an arrow) was then futile, faced a state of speechlessness.
सारांश
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बाणों से खाली हुए तरकश की स्थिति वैसी ही थी जैसे निर्धन हुए मित्र से की गई याचना निष्फल हो जाती है और व्यक्ति मौन लज्जा के साथ खड़ा रह जाता है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
च्युत इति ॥शरा एवार्थो धनं तस्माच्च्युते भ्रष्टे तस्मिन्निषुधौ निषङ्गे सहसा झटिति ध्वस्तार्थसारेऽकाण्डे नष्टधनसारे बन्धाविव तत्काले मोघो वितथःप्रणयः प्रीतिर्यस्य सः। तत्कालकृतव्यर्थप्रार्थनः । पूर्वं कृतार्थ एवेति भावः । स पाणिः । निर्वाच्यतां कृतज्ञत्वादपवादाहित्यं कामयत इति निर्वाच्यताकामः । शीलिकामिभक्ष्याचरिभ्यो णः। स इवेत्युत्प्रेक्षा । आभिमुख्यं प्रयेदे । यथा कश्चित्कृतज्ञस्तत्कालेऽकृतोपकारमपि बन्धुं पूर्वोपकारस्मरणात्पुनः पुनरनुबध्नाति तद्वदित्यर्थः ।
पदच्छेदः
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| च्युते | च्युत (√च्यु+क्त, ७.१) | having failed |
| सः | तद् (१.१) | he (Arjuna) |
| तस्मिन् | तद् (७.१) | in that |
| इषुधौ | इषुधि (७.१) | in the quiver |
| शरार्थात् | शर–अर्थ (५.१) | from the purpose of arrows |
| ध्वस्तार्थसारे | ध्वस्त–अर्थसार (७.१) | in which the essential purpose was destroyed |
| सहसा | सहसा | suddenly |
| इव | इव | like |
| बन्धौ | बन्धु (७.१) | in a kinsman |
| तत्कालमोघप्रणयः | तत्काल–मोघ–प्रणय (१.१) | he whose request was futile at that moment |
| प्रपेदे | प्रपेदे (प्र√पद् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | attained |
| निर्वाच्यताकामः | निर्वाच्यता–काम (१.१) | as if desiring to be speechless |
| इव | इव | as if |
| आभिमुख्यम् | आभिमुख्य (२.१) | the state of facing |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| च्यु | ते | स | त | स्मि | न्नि | षु | धौ | श | रा | र्था |
| द्ध्व | स्ता | र्थ | सा | रे | स | ह | से | व | ब | न्धौ |
| त | त्का | ल | मो | घ | प्र | ण | यः | प्र | पे | दे |
| नि | र्वा | च्य | ता | का | म | इ | वा | भि | मु | ख्यम् |
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