रिक्ते सविस्रम्भमथर्जुनस्य
निषङ्गवक्त्रे निपतात पाणिः ।
अन्यद्विपापीतजले सतर्षं
मतङ्गजस्येव नगाश्मरन्ध्रे ॥
रिक्ते सविस्रम्भमथर्जुनस्य
निषङ्गवक्त्रे निपतात पाणिः ।
अन्यद्विपापीतजले सतर्षं
मतङ्गजस्येव नगाश्मरन्ध्रे ॥
निषङ्गवक्त्रे निपतात पाणिः ।
अन्यद्विपापीतजले सतर्षं
मतङ्गजस्येव नगाश्मरन्ध्रे ॥
अन्वयः
AI
अथ अर्जुनस्य पाणिः रिक्ते निषङ्गवक्त्रे सविस्रम्भम् निपपात, सतर्षम् (पाणिः) अन्यद्विपापीतजले नगाश्मरन्ध्रे मतङ्गजस्य (पाणिः) इव ।
English Summary
AI
Then, Arjuna's hand confidently reached for the mouth of his quiver, only to find it empty. It was like a thirsty elephant's trunk reaching into a mountain rock cavity where the water had already been drunk by another elephant.
सारांश
AI
अर्जुन का हाथ खाली तरकश में उसी विश्वास के साथ गया, जैसे कोई प्यासा हाथी पर्वत की उस गुहा में सूँड डालता है जिसका जल पहले ही पिया जा चुका हो।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
रिक्त इति ॥अथ बाणान्तर्धानानन्तरमर्जुनस्य पाणिः करो रिक्ते बाणशुन्ये निषङ्गचक्रे तूणीरमुखेऽन्यद्विपेन गजान्तरेणापीतजले पीततोये नगस्याचलस्याश्मरन्ध्रे शिलागर्ते। प्रदर इत्यर्थः । सतर्षं सतृष्णं यथा स्यात्तथा मतङ्गजस्य पाणिर्लक्षणयां कर इव सविस्त्रम्भं सन्त्येव बाणा इति सविश्वासं निपपात ॥
पदच्छेदः
AI
| रिक्ते | रिक्त (√रिच्+क्त, ७.१) | in the empty |
| सविस्रम्भम् | सविस्रम्भम् | confidently |
| अथ | अथ | then |
| अर्जुनस्य | अर्जुन (६.१) | of Arjuna |
| निषङ्गवक्त्रे | निषङ्ग–वक्त्र (७.१) | in the mouth of the quiver |
| निपपात | निपपात (नि√पत् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | fell upon |
| पाणिः | पाणि (१.१) | the hand |
| अन्यद्विपापीतजले | अन्य–द्विप–आपीत–जल (७.१) | in which the water has been drunk by another elephant |
| सतर्षम् | सतर्षम् | thirstily |
| मतङ्गजस्य | मतङ्गज (६.१) | of an elephant |
| इव | इव | like |
| नगाश्मरन्ध्रे | नग–अश्म–रन्ध्र (७.१) | in a cavity in a mountain rock |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रि | क्ते | स | वि | स्र | म्भ | म | थ | र्जु | न | स्य |
| नि | ष | ङ्ग | व | क्त्रे | नि | प | ता | त | पा | णिः |
| अ | न्य | द्वि | पा | पी | त | ज | ले | स | त | र्षं |
| म | त | ङ्ग | ज | स्ये | व | न | गा | श्म | र | न्ध्रे |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.