अनामृशन्तः क्वचिदेव मर्म
प्रियैषिणानुप्रहिताः शिवेन ।
सुहृत्प्रयुक्ता इव नर्मवादाः
शरा मुनेः प्रीतिकरा बभूवुः ॥

अन्वयः AI शिवेन प्रियैषिणा अनुप्रहिताः, क्वचित् एव मर्म अनामृशन्तः शराः, सुहृत्प्रयुक्ताः नर्मवादाः इव, मुनेः प्रीतिकराः बभूवुः ।
English Summary AI The arrows dispatched by the well-wishing Shiva, which never touched any vital spot, became a source of pleasure for the sage (Arjuna), like jests uttered by a friend.
सारांश AI शिव द्वारा स्नेहपूर्वक छोड़े गए बाण अर्जुन के मर्मस्थानों को चोट पहुँचाए बिना उन्हें वैसे ही सुख दे रहे थे, जैसे किसी प्रिय मित्र द्वारा किए गए परिहास सुखद लगते हैं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः) अनामृशन्त इति ॥ प्रियैषिणा प्रियचिकीर्षुणा शिवेनानुप्रहिताः प्रयुक्ता अत एव क्व चिदेव मर्मानामृशन्तोऽस्पृशन्तः शराः सुहृन्मित्रं सोऽपि प्रियैषी तेन प्रयुक्ता उच्चारिता नर्मवादाः प्रियवादा इव मुनेरर्जुनस्य प्रीतिकराः प्रीतिजनका बभूवुः ॥
पदच्छेदः AI
अनामृशन्तःअनामृशत् (आ+नञ्√मृश्+शतृ, १.३) not touching
क्वचिदेवक्वचित्एव anywhere at all
मर्ममर्मन् (२.१) a vital spot
प्रियैषिणाप्रियैषिन् (३.१) by one who wishes well
अनुप्रहिताःअनुप्रहित (अनु+प्र√हि+क्त, १.३) dispatched
शिवेनशिव (३.१) by Shiva
सुहृत्प्रयुक्ताःसुहृद्प्रयुक्त (१.३) uttered by a friend
इवइव like
नर्मवादाःनर्मवाद (१.३) jests
शराःशर (१.३) the arrows
मुनेःमुनि (६.१) of the sage (Arjuna)
प्रीतिकराःप्रीतिकर (१.३) pleasure-giving
बभूवुःबभूवुः (√भू कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) they became
छन्दः उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
ना मृ न्तः क्व चि दे र्म
प्रि यै षि णा नु प्र हि ताः शि वे
सु हृ त्प्र यु क्ता र्म वा दाः
रा मु नेः प्री ति रा भू वुः
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