अन्वयः
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सः अतिसौष्ठवेन सायकान् क्षिपन्, साध्वसविप्लुतानाम् परेषां, दोषआवृतलोचनानाम् शशी इव, विभिद्यमानः पृथक् आबभासे।
English Summary
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Shooting arrows with extreme skill, he appeared multiplied and distinct to his enemies, who were bewildered with fear, just as the moon appears multiplied to those whose eyes are afflicted by a defect (like diplopia).
सारांश
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शिव ने डरे हुए शत्रुओं पर अत्यधिक कुशलता से बाण छोड़े। जैसे दृष्टि दोष वाले को एक ही चन्द्रमा अनेक रूपों में दिखता है, वैसे ही शिव रणभूमि में विभिन्न रूपों में सुशोभित हुए।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
स इति ॥ अतिसौष्ठवेनातिलाघवेन सायकाञ्शरान्क्षिपन्सोऽर्जुनः साध्वसेन विप्लुतानां भ्रान्तानां परेषां द्विषां दोषेण काचकामलादिरोगेणावृतलोचनानां दुष्टचक्षुषां शशीव पृथग्विभिद्यमान आवभासे । यथा सदोषचक्षुषैकश्चन्द्रो नानेव लक्ष्यते तद्वदेकोऽप्यनेक इव दृष्ट इति भावः ॥
पदच्छेदः
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| स | तद् (१.१) | He |
| सायकान् | सायक (२.३) | arrows |
| साध्वसविप्लुतानां | साध्वस–विप्लुत (वि√प्लु+क्त, ६.३) | of those bewildered with fear |
| क्षिपन् | क्षिपत् (√क्षिप्+शतृ, १.१) | shooting |
| परेषाम् | पर (६.३) | of the enemies |
| अतिसौष्ठवेन | अति–सौष्ठव (३.१) | with extreme skill |
| शशीव | शशिन् (१.१)–इव | like the moon |
| दोषावृतलोचनानां | दोष–आवृत (आ√वृ+क्त)–लोचन (६.३) | of those whose eyes are afflicted by a defect |
| विभिद्यमानः | विभिद्यमान (वि√भिद्+यक्+शानच्, १.१) | appearing multiplied |
| पृथग् | पृथक् | distinctly |
| आबभासे | आबभासे (आ√भास् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | shone |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | सा | य | का | न्सा | ध्व | स | वि | प्लु | ता | नां |
| क्षि | प | न्प | रे | षा | म | ति | सौ | ष्ठ | वे | न |
| श | शी | व | दो | षा | वृ | त | लो | च | ना | नां |
| वि | भि | द्य | मा | नः | पृ | थ | गा | ब | भा | से |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||
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