दृष्टावदानाद्व्यथतेऽरिलोकः
प्रध्वंसमेति व्यथिताच्च तेजः ।
तेजोविहीनं विजहाति दर्पः
शान्तार्चिषं दीपमिव प्रकाशः ॥

अन्वयः AI दृष्टावदानात् अरिलोकः व्यथते, व्यथितात् च तेजः प्रध्वंसम् एति। दर्पः तेजोविहीनम् विजहाति, प्रकाशः शान्तार्चिषम् दीपम् इव।
English Summary AI The enemy world is distressed by seeing one's heroic deeds. From the distressed, valor perishes. Pride abandons the one devoid of valor, just as light abandons a lamp whose flame is extinguished.
सारांश AI वीरता के कार्यों को देखकर शत्रु सेना व्यथित होती है, व्यथित होने से उनका तेज नष्ट हो जाता है और तेजहीन होने पर उनका गर्व वैसे ही चला जाता है जैसे बुझे हुए दीपक से प्रकाश चला जाता है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः) दृष्टेति ॥ दृष्टमवदानं महत्कर्म यस्य तस्मादृष्टावदानाद्दृष्टपौरुषादरिलोकः शत्रुजनो व्यथते बिभेति । व्यथिताद्भीतात्तेजः प्रध्वंसं नाशमेति । तेजोविहीनं दर्प उत्साहः शान्तार्चिषं निर्वाणज्वालं दीपं प्रकाश इव विजहाति त्यजति ।
पदच्छेदः AI
दृष्टावदानात्दृष्ट (√दृश्+क्त)अवदान (५.१) from one whose heroic deeds are seen
व्यथतेव्यथते (√व्यथ् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) is distressed
अरिलोकःअरिलोक (१.१) the enemy world
प्रध्वंसमेतिप्रध्वंसम् (२.१)एति (√इ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) perishes
व्यथिताच्चव्यथित (√व्यथ्+क्त, ५.१) and from the distressed one
तेजःतेजस् (१.१) valor
तेजोविहीनंतेजस्विहीन (२.१) the one devoid of valor
विजहातिविजहाति (वि√हा कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) abandons
दर्पःदर्प (१.१) pride
शान्तार्चिषंशान्त (√शम्+क्त)अर्चिस् (२.१) whose flame is extinguished
दीपमिवदीप (२.१)इव like a lamp
प्रकाशःप्रकाश (१.१) light
छन्दः इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
दृ ष्टा दा ना द्व्य ते ऽरि लो कः
प्र ध्वं मे ति व्य थि ता च्च ते जः
ते जो वि ही नं वि हा ति र्पः
शा न्ता र्चि षं दी मि प्र का शः
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