स प्रध्वनय्याम्बुदनादि चापं
हस्तेन दिङ्नाग इवाद्रिशृङ्गम् ।
बलानि शम्भोरिषुभिस्तताप
चेतांसि चिन्ताभिरिवाशरीरः ॥
स प्रध्वनय्याम्बुदनादि चापं
हस्तेन दिङ्नाग इवाद्रिशृङ्गम् ।
बलानि शम्भोरिषुभिस्तताप
चेतांसि चिन्ताभिरिवाशरीरः ॥
हस्तेन दिङ्नाग इवाद्रिशृङ्गम् ।
बलानि शम्भोरिषुभिस्तताप
चेतांसि चिन्ताभिरिवाशरीरः ॥
अन्वयः
AI
सः, दिङ्नागः हस्तेन अद्रिशृङ्गम् इव, अम्बुदनादि चापम् प्रध्वनय्य, शम्भोः बलानि इषुभिः तताप, अशरीरः चिन्ताभिः चेतांसि इव।
English Summary
AI
Twanging his bow, which sounded like a thundercloud, he tormented Shambhu's forces with arrows, just as a directional elephant strikes a mountain peak with its trunk, and as the bodiless god of love (Kama) torments minds with anxieties.
सारांश
AI
बादलों के समान गर्जना करने वाले धनुष को दिग्गज द्वारा पर्वत शिखर पकड़ने के समान हाथों में लेकर, अर्जुन ने शिव की सेना को बाणों से उसी प्रकार पीड़ित किया जैसे कामदेव चिंता से मन को तपाता है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
स इति ॥ सोऽर्जुनोऽम्बुदवन्नदतीत्यम्बुदनादि ।
कर्तर्युपमाने (अष्टाध्यायी ३.२.७९ ) इति णिनिः । चापं दिङ्नागो दिग्गजोऽद्रिशृङ्गमिव हस्तेन करेण प्रध्वनय्य ध्वनयित्वा शंभोर्बलानि सैन्यान्यशरीरोऽनङ्गःकामश्चेतांसि युवमनांसि चिन्ताभिः प्रेयोजनध्यानैरिवेषुभिस्तताप तापयामास । तपतिः सकर्मकः । अत्रेषुशब्दः स्त्रीलिङ्गः। अन्यथोपमानोपमेययोर्भिन्नलिङ्गतादोषात् । पत्री रोष इषुर्द्वयोः इत्यमरः (अमरकोशः २.८.८७ ) ॥
पदच्छेदः
AI
| स | तद् (१.१) | He |
| प्रध्वनय्य | प्रध्वनय्य (प्र√ध्वन्+णिच्+ल्यप्) | having twanged |
| अम्बुदनादि | अम्बुद–नादिन् (२.१) | which sounded like a thundercloud |
| चापं | चाप (२.१) | the bow |
| हस्तेन | हस्त (३.१) | with his hand |
| दिङ्नाग | दिक्–नाग (१.१) | a directional elephant |
| इव | इव | like |
| अद्रिशृङ्गम् | अद्रि–शृङ्ग (२.१) | a mountain peak |
| बलानि | बल (२.३) | the forces |
| शम्भोरिषुभिस्तताप | शम्भु (६.१)–इषुभिः (३.३)–तताप (√तप् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | of Shambhu, he tormented with arrows |
| चेतांसि | चेतस् (२.३) | minds |
| चिन्ताभिरिव | चिन्ता (३.३)–इव | like with anxieties |
| अशरीरः | अशरीर (१.१) | the bodiless one (Kama) |
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | प्र | ध्व | न | य्या | म्बु | द | ना | दि | चा | पं |
| ह | स्ते | न | दि | ङ्ना | ग | इ | वा | द्रि | शृ | ङ्गम् |
| ब | ला | नि | श | म्भो | रि | षु | भि | स्त | ता | प |
| चे | तां | सि | चि | न्ता | भि | रि | वा | श | री | रः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.