इति विविधमुदासे सव्यसाची यदस्त्रं
बहुसमरनयज्ञः सादयिष्यन्नरातिम् ।
विधिरिव विपरीतः पौरुषं न्यायवृत्तेः
सपदि तदुपनिन्ये रिक्ततां नीलकण्ठः ॥
इति विविधमुदासे सव्यसाची यदस्त्रं
बहुसमरनयज्ञः सादयिष्यन्नरातिम् ।
विधिरिव विपरीतः पौरुषं न्यायवृत्तेः
सपदि तदुपनिन्ये रिक्ततां नीलकण्ठः ॥
बहुसमरनयज्ञः सादयिष्यन्नरातिम् ।
विधिरिव विपरीतः पौरुषं न्यायवृत्तेः
सपदि तदुपनिन्ये रिक्ततां नीलकण्ठः ॥
अन्वयः
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इति बहुसमरनयज्ञः सव्यसाची अरातिम् सादयिष्यन् यत् अस्त्रम् विविधम् उदासे, विपरीतः विधिः न्यायवृत्तेः पौरुषम् इव, नीलकण्ठः तत् सपदि रिक्तताम् उपनिन्ये।
English Summary
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Thus, whatever various weapons Arjuna, skilled in the strategies of many battles, discharged to destroy his enemy, Shiva (Nilakantha), like adverse fate nullifying the effort of a righteous person, immediately rendered them all futile.
सारांश
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युद्ध नीति के ज्ञाता अर्जुन ने शत्रु को हराने के लिए जिन विविध अस्त्रों का प्रयोग किया, भगवान शिव ने उन्हें वैसे ही तत्काल निष्फल कर दिया जैसे विपरीत भाग्य किसी न्यायपरायण व्यक्ति के पुरुषार्थ को व्यर्थ कर देता है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
इतीति ॥ बहुसमरनयाननेकरणोपायाञ्जानातीति वहुसमरनवज्ञ:।
आतोऽनुपसर्गे कः (अष्टाध्यायी ३.२.३ ) इति कप्रत्ययः। न तु इगुपध- (अष्टाध्यायी ३.१.१३५ ) इत्यादिनाकारान्तादनुपपदात्कर्मोपपदो भवति। विप्रतिषेधेन इति वार्तिकव्याख्याने भाष्यकारेणार्थज्ञशब्दमुदाहृत्यास्यार्थज्ञशब्दस्य कर्मोपपदत्वं दर्शितम् । सव्यसाच्यर्जुनोऽरातिं किरातपतिं सादयिष्यन् । अवसादयितुकामः सन्नित्यर्थः । क्रियार्थक्रियायां लृटि तस्य शत्रादेशः । इति पूर्वोक्तप्रकारेण विविधं यदस्त्रमुदासे। प्रयुक्तवानित्यर्थः । उपसर्गादस्यत्यूह्योर्वेति वाच्यम् इत्यात्मनेपदम् । विपरीतो विधिः प्रतिकूलं दैवम्।विधिर्विधाने दैवेऽपिइत्यमरः (अमरकोशः ३.३.१०७ ) । न्यायेन नीत्या वृत्तिर्वर्तनं यस्य तस्य नीतिनिष्ठस्य पौरूषमिव नीलकण्ठः शिवः सपदि तदस्त्रं रिक्ततां व्यर्थतामुपनिन्ये । संहृतवानित्यर्थः । मालिनीवृत्तम् ॥ वीतप्रभावतनुरप्यत्तनुप्रभावः प्रत्याचकाङ्क्ष जयिनीं भुजवीर्यलक्ष्मीम्। अस्त्रेषु भूतपतिनापहृतेषु जिष्णुर्वर्षिष्यता दिनकृतेव जलेषु लोकः
पदच्छेदः
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| इति | इति | Thus |
| विविधम् | विविध | variously |
| उदासे | उदासे (उद्√अस् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | discharged |
| सव्यसाची | सव्यसाचिन् (१.१) | Savyasachi (Arjuna) |
| यत् | यद् (२.१) | which |
| अस्त्रम् | अस्त्र (२.१) | weapon |
| बहुसमरनयज्ञः | बहु–समर–नय–ज्ञ (१.१) | the one skilled in the strategies of many battles |
| सादयिष्यन् | सादयिष्यत् (√सद्+णिच्+लृट्-शतृ, १.१) | wishing to destroy |
| अरातिम् | अराति (२.१) | the enemy |
| विधिरिव | विधि (१.१)–इव | like fate |
| विपरीतः | विपरीत (वि+परि√इ+क्त, १.१) | adverse |
| पौरुषम् | पौरुष (२.१) | the effort |
| न्यायवृत्तेः | न्याय–वृत्ति (६.१) | of a righteous person |
| सपदि | सपदि | immediately |
| तत् | तद् (२.१) | it |
| उपनिन्ये | उपनिन्ये (उप√नी कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | brought to |
| रिक्तताम् | रिक्तता (२.१) | emptiness/futility |
| नीलकण्ठः | नील–कण्ठ (१.१) | Nilakantha (Shiva) |
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ति | वि | वि | ध | मु | दा | से | स | व्य | सा | ची | य | द | स्त्रं |
| ब | हु | स | म | र | न | य | ज्ञः | सा | द | यि | ष्य | न्न | रा | तिम् |
| वि | धि | रि | व | वि | प | री | तः | पौ | रु | षं | न्या | य | वृ | त्तेः |
| स | प | दि | त | दु | प | नि | न्ये | रि | क्त | तां | नी | ल | क | ण्ठः |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
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