प्रवृद्धसिन्धूर्मिचयस्थवीयसां
चयैर्विभिन्नाः पयसां प्रपेदिरे ।
उपात्तसंध्यारुचिभिः सरूपतां
पयोदविच्छेदलवैः कृशानवः ॥
प्रवृद्धसिन्धूर्मिचयस्थवीयसां
चयैर्विभिन्नाः पयसां प्रपेदिरे ।
उपात्तसंध्यारुचिभिः सरूपतां
पयोदविच्छेदलवैः कृशानवः ॥
चयैर्विभिन्नाः पयसां प्रपेदिरे ।
उपात्तसंध्यारुचिभिः सरूपतां
पयोदविच्छेदलवैः कृशानवः ॥
अन्वयः
AI
प्रवृद्ध-सिन्धु-ऊर्मि-चय-स्थवीयसाम् पयसाम् चयैः विभिन्नाः कृशानवः उपात्त-संध्या-रुचिभिः पयोद-विच्छेद-लवैः सरूपताम् प्रपेदिरे।
English Summary
AI
The fires, broken apart by torrents of water as massive as the swelling waves of the ocean, attained similarity with fragments of clouds that had caught the glow of twilight.
सारांश
AI
समुद्र की लहरों के समान जल की भारी धाराओं से खंडित हुई अग्नि की लपटें संध्या की लालिमा से युक्त बादलों के छोटे-छोटे टुकड़ों के समान दिखाई देने लगीं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
प्रवृद्धेति॥प्रवृद्धानां सिन्धोःसमुद्रस्योर्मीणांचयाराशय इव स्थवीयसांस्थूलतराणां पयसां चयैः पूरैर्विभिन्ना विश्लेषिताः कृशानवोऽग्नय उपात्तसंध्यारुचिभिः प्राप्तसंध्यारागैः पयोदानां विच्छिद्यन्त इति विच्छेदा विच्छिन्ना विक्षिप्ता ये लवा: शकलास्तैः सरूपतां समानरूपतां प्रपेदिर इत्युपमा ॥
पदच्छेदः
AI
| प्रवृद्धसिन्धूर्मिचयस्थवीयसां | प्रवृद्ध–सिन्धु–ऊर्मि–चय–स्थवीयस् (६.३) | of those more massive than the swelling waves of the ocean |
| चयैः | चय (३.३) | by torrents |
| विभिन्नाः | विभिन्न (वि√भिद्+क्त, १.३) | broken apart |
| पयसाम् | पयस् (६.३) | of water |
| प्रपेदिरे | प्रपेदिरे (प्र√पद् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | attained |
| उपात्तसंध्यारुचिभिः | उपात्त–संध्या–रुचि (३.३) | by those that had caught the glow of twilight |
| सरूपताम् | सरूपता (२.१) | similarity |
| पयोदविच्छेदलवैः | पयोद–विच्छेद–लव (३.३) | with fragments of clouds |
| कृशानवः | कृशानु (१.३) | the fires |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | वृ | द्ध | सि | न्धू | र्मि | च | य | स्थ | वी | य | सां |
| च | यै | र्वि | भि | न्नाः | प | य | सां | प्र | पे | दि | रे |
| उ | पा | त्त | सं | ध्या | रु | चि | भिः | स | रू | प | तां |
| प | यो | द | वि | च्छे | द | ल | वैः | कृ | शा | न | वः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.