अन्वयः
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विवस्वत्-अंशु-संश्लेष-द्विगुणीकृत-तेजसः अमी महा-असयः मोघम् उद्गूर्णाः वः हसन्ति इव ।
English Summary
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"These great swords of yours, their brilliance doubled by the sun's rays, seem to laugh at you, being brandished in vain."
सारांश
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सूर्य की किरणों के स्पर्श से दुगुनी चमक वाली तुम्हारी ये विशाल तलवारें, व्यर्थ में म्यान से बाहर निकाले जाने के कारण मानो तुम पर हँस रही हैं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
विवस्वदिति ॥ विवस्वदंशुसंश्लेषेण सूर्यकिरणसंपर्केण द्विगुणीकृतान्युत्तेजितानि तेजांसि येषां ते तथोक्ता मोघं व्यर्थमुद्भूर्णा उद्यताः ।
गुरी उद्यमने इति धातोः कर्मणि क्तः । वो युष्माकममी महासयः खङ्गा हसन्तीवेत्युत्प्रेक्षा । किं पलायमानानां खङ्गैरिति हासः॥
पदच्छेदः
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| विवस्वत्-अंशु-संश्लेष-द्विगुणीकृत-तेजसः | विवस्वत्–अंशु–संश्लेष–द्विगुणीकृत–तेजस् (१.३) | those whose brilliance is doubled by contact with the sun's rays |
| अमी | अदस् (१.३) | these |
| वः | युष्मद् (२.३) | at you |
| मोघम् | मोघ (२.१) | in vain |
| उद्गूर्णाः | उद्गूर्ण (उद्√गॄ+क्त, १.३) | brandished |
| हसन्ति | हसन्ति (√हस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | are laughing |
| इव | इव | as if |
| महा-असयः | महा–असि (१.३) | great swords |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | व | स्व | दं | शु | सं | श्ले | ष |
| द्वि | गु | णी | कृ | त | ते | ज | सः |
| अ | मी | वो | मो | घ | मु | द्गू | र्णा |
| ह | स | न्ती | व | म | हा | स | यः |
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