अन्वयः
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अथ अग्रे साचि स्थितेन, हसता, किंचित् आयस्त-चेतसा, स्थिर-कीर्तिना सेनान्या ते जगदिरे ।
English Summary
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Then, they (the Ganas) were addressed by the army commander of lasting fame (Arjuna), who stood before them, smiling and looking askance, his mind slightly pained by their plight.
सारांश
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तब स्थिर कीर्ति वाले सेनापति कार्तिकेय ने मुस्कुराते हुए और कुछ व्यथित मन से उन पलायन करते हुए सैनिकों को संबोधित कर यह बात कही।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
अथेति ॥ अथाग्रे। बलानामित्यर्थः । हसता तद्भङ्गदर्शनात्स्मयमानेन साचिस्थितेन तन्निवारणाय तिर्यग्व्यवस्थितेन ।
तिर्यगर्थे साचि तिरः इत्यमरः (अमरकोशः ३.४.६ ) । स्थिरकीर्तिना। स्वयमभङ्गत्वादिति भावः । किंचिदीषदायस्तं खिन्नं चेतो यस्य तेन स्वकीयगणभङ्गादीषत्खिन्नचित्तेन सेनान्या स्कन्देन । पार्वतीनन्दनः स्कन्दः सेनानीरग्निभूर्गुहः इत्यमरः (अमरकोशः १.१.४९ ) । ते गणाः प्रमथादयो जगदिर उक्ताः । ओष्ट्यवर्णाभावान्निरौष्ट्यमेतत् ॥ अथैकविंशतिभिः श्लोकैः स्कन्दवाक्यमेवाह—मा विहासिष्टेत्यादिना ॥
पदच्छेदः
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| अथ | अथ | Then |
| अग्रे | अग्र (७.१) | in front |
| हसता | हसत् (√हस्+शतृ, ३.१) | by the smiling one |
| साचि | साचि | askance |
| स्थितेन | स्थित (√स्था+क्त, ३.१) | by the one standing |
| स्थिर-कीर्तिना | स्थिर–कीर्ति (३.१) | by the one of lasting fame |
| सेनान्या | सेनानी (३.१) | by the army commander |
| ते | तद् (१.३) | they |
| जगदिरे | जगदिरे (√गद् भावकर्मणोः लिट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | were told |
| किंचित् | किंचित् | somewhat |
| आयस्त-चेतसा | आयस्त–चेतस् (३.१) | by him whose mind was slightly pained |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | था | ग्रे | ह | स | ता | सा | चि |
| स्थि | ते | न | स्थि | र | की | र्ति | ना |
| से | ना | न्या | ते | ज | ग | दि | रे |
| किं | चि | दा | य | स्त | चे | त | सा |
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