सम्पश्यतामिति शिवेन वितायमानं
लक्ष्मीवतः क्षितिपतेस्तनयस्य वीर्यम् ।
अङ्गान्यभिन्नमपि तत्त्वविदां मुनीनां
रोमाञ्चमञ्चिततरं बिभराम्बभूवुः ॥
सम्पश्यतामिति शिवेन वितायमानं
लक्ष्मीवतः क्षितिपतेस्तनयस्य वीर्यम् ।
अङ्गान्यभिन्नमपि तत्त्वविदां मुनीनां
रोमाञ्चमञ्चिततरं बिभराम्बभूवुः ॥
लक्ष्मीवतः क्षितिपतेस्तनयस्य वीर्यम् ।
अङ्गान्यभिन्नमपि तत्त्वविदां मुनीनां
रोमाञ्चमञ्चिततरं बिभराम्बभूवुः ॥
अन्वयः
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इति शिवेन सम्पश्यताम्, तत्त्वविदाम् मुनीनाम् अङ्गानि, लक्ष्मीवतः क्षितिपतेः तनयस्य वितायमानम् वीर्यम् अभिन्नम् अपि, अञ्चिततरम् रोमाञ्चम् बिभराम्बभूवुः ।
English Summary
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The limbs of the truth-knowing sages, who were watching along with Shiva, bore prominent horripilation, even though they were not physically pierced, at the sight of the valor being displayed by Arjuna, son of the prosperous king Indra.
सारांश
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शिव द्वारा परीक्षित अर्जुन के इस अद्भुत पराक्रम को देखकर तत्वज्ञानी मुनियों के शरीर में रोमांच हो आया, मानो उनके हृदय वीरता के रस से भर गए हों।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
संपश्यतामिति ॥ इतीत्थं शिवेन वितायमानं विस्तार्यमाणम् ।
तनोतेर्यकि (अष्टाध्यायी ६.४.४४ ) इति वैकल्पिक आकारादेशः । लक्ष्मीवतो जयश्रीमतः । मादुपधाया:-इत्यादिना मतुपो मस्य वकारः। क्षितिपतेस्तनयस्यार्जुनस्य वीर्यं शौर्यं संपश्यतां तत्त्वविदामपि हरेरंशावतारोऽयमिति विदुषामपि । किमुतान्येषामिति भावः । मुनीनामङ्गानि गात्राण्यभिन्नमविरलमञ्चिततरमतिरुचिरं रोमाञ्चं रोमहर्षं विभरांबभूवुर्बभ्रुः । भीह्री- (अष्टाध्यायी ६.१.१९२ ) इत्यादिना विकल्पादाम्प्रत्ययः (अष्टाध्यायी ३.१.१ )
पदच्छेदः
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| सम्पश्यताम् | सम्पश्यत् (सम्√दृश्+शतृ, ६.३) | of those watching |
| इति | इति | thus |
| शिवेन | शिव (३.१) | with Shiva |
| वितायमानम् | वितायमान (वि√तन्+यक्+शानच्, २.१) | being displayed |
| लक्ष्मीवतः | लक्ष्मीवत् (६.१) | of the prosperous |
| क्षितिपतेः | क्षिति–पति (६.१) | of the king (Indra) |
| तनयस्य | तनय (६.१) | of the son (Arjuna) |
| वीर्यम् | वीर्य (२.१) | the valor |
| अङ्गानि | अङ्ग (१.३) | the limbs |
| अभिन्नम् | अ–भिन्न (१.३) | not pierced |
| अपि | अपि | even / though |
| तत्त्वविदाम् | तत्त्व–विद् (६.३) | of the knowers of truth |
| मुनीनाम् | मुनि (६.३) | of the sages |
| रोमाञ्चम् | रोमाञ्च (२.१) | horripilation |
| अञ्चिततरम् | अञ्चित–तरप् (२.१) | more prominent |
| बिभराम्बभूवुः | बिभराम्बभूवुः (√भृ +आम् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | bore |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | म्प | श्य | ता | मि | ति | शि | वे | न | वि | ता | य | मा | नं |
| ल | क्ष्मी | व | तः | क्षि | ति | प | ते | स्त | न | य | स्य | वी | र्यम् |
| अ | ङ्गा | न्य | भि | न्न | म | पि | त | त्त्व | वि | दां | मु | नी | नां |
| रो | मा | ञ्च | म | ञ्चि | त | त | रं | बि | भ | रा | म्ब | भू | वुः |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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