अन्वयः
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अयुगलोचनस्य बाणः घनम् अर्जुनबाणपूगम् विदार्य ससार । अयुगलोचनस्य बाणः अर्जुनबाणपूगम् घनम् विदार्य ससार ।
English Summary
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The arrow of the odd-eyed one (Shiva) went forth, having pierced the dense multitude of Arjuna's arrows. The arrow of the odd-eyed one went forth, having split the multitude of Arjuna's arrows as if it were a cloud.
सारांश
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त्रिलोचन शिव का प्रभावशाली बाण अर्जुन के सघन बाण-समूह को छिन्न-भिन्न कर उसी प्रकार आगे बढ़ा, जैसे सूर्य की किरण घने बादलों को चीर देती है।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
घनमिति ॥ अयुगलोचनस्य विषमनेत्रस्येशस्यालोचनस्य । लोच्यतेऽसौ लोचनः । कर्मणि ल्युट् । न लोचनोऽलोचनस्तस्यालोचनस्याचाक्षुषज्ञानविषयस्य संबन्धी सारो बलं वाणः शब्दस्ताभ्यां सारवाणाभ्यां स्थिरशब्दाभ्यां सह वर्तते इति ससारवाणः । बवयोरभेद इत्युक्तम् । न युज्यते कुत्रापीत्ययुक्सङ्गरहितः। क्विप् । बाणः शरः । जातावेकवचनम् । घनं सान्द्रमर्जुनस्य बाणपूगं शरव्रातं विदार्य विभिद्य घनं निबिडं विदार्यो भूमिकूष्माण्ड्यो लताविशेषा अर्जुनाः ककुभवृक्षा बाणा नीलसैरेयकाः पूगाः क्रमुकास्तेषाम् ।
विभाषा वृक्ष- (अष्टाध्यायी २.४.१२ ) इत्यादिना द्वन्द्वैकवद्भावः। विदार्यार्जुनबाणपूगं ससार । विवेशेत्यर्थः। 'सृ गतौ । यद्वा तदानीमेव युगलोचनस्यार्जुनस्य बाणः ससारेत्यर्थः ॥ रुजन्महेषून्बहुधाशुपातिनो मुहुः शरौघैरपवारयन्दिशः। चलाचलोऽनेक इव क्रियावशान्महर्षिसंघैर्बुबुधे धनंजयः
पदच्छेदः
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| घनम् | घन (२.१) | dense / a cloud |
| विदार्य | विदार्य (वि√दृ+णिच्+ल्यप्) | having split/pierced |
| अर्जुनबाणपूगम् | अर्जुन–बाण–पूग (२.१) | the multitude of Arjuna's arrows |
| ससार | ससार (√सृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | moved/went |
| बाणः | बाण (१.१) | the arrow |
| अयुगलोचनस्य | अयुग–लोचन (६.१) | of the odd-eyed one (Shiva) |
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| घ | नं | वि | दा | र्या | र्जु | न | बा | ण | पू | गं |
| स | सा | र | बा | णो | ऽयु | ग | लो | च | न | स्य |
| घ | नं | वि | दा | र्या | र्जु | न | बा | ण | पू | गं |
| स | सा | र | बा | णो | ऽयु | ग | लो | च | न | स्य |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||
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