अन्वयः
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शम्भुना विफलीकृतयत्नस्य क्षतबाणस्य गाण्डीवधन्वनः खेभ्यः हुताशनः निश्चचार ।
English Summary
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Fire emerged from the quivers of Arjuna, the wielder of the Gandiva bow, whose efforts had been frustrated and whose arrows had been destroyed by Shiva.
सारांश
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शिव द्वारा अपने बाणों और प्रयत्नों को विफल पाकर, कुपित गाण्डीवधारी अर्जुन के इंद्रिय-द्वारों से क्रोधाग्नि प्रस्फुटित होने लगी।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
विफलीति ॥ शंभुना क्षतबाणस्यातएव विफलीकृतयत्नस्य निष्फलप्रयत्नस्य गाण्डीवं धनुर्यस्य तस्य गाण्डीवधन्वनोऽर्जुनस्य ।
वा संज्ञायाम् (अष्टाध्यायी ५.४.१३३ ) इत्यनङादेशः । खेभ्य इन्द्रियरन्ध्रेभ्यः । खमिन्द्रिये सुखे स्वर्ग इति विश्वः । हुताशनोऽग्निर्निश्चक्राम निष्क्रान्तः। क्रोधादिति भावः ॥
पदच्छेदः
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| विफलीकृतयत्नस्य | विफलीकृत–यत्न (६.१) | of him whose efforts were made fruitless |
| क्षतबाणस्य | क्षत–बाण (६.१) | of him whose arrows were destroyed |
| शम्भुना | शम्भु (३.१) | by Shambhu (Shiva) |
| गाण्डीवधन्वनः | गाण्डीव–धन्वन् (६.१) | of the wielder of the Gandiva bow (Arjuna) |
| खेभ्यः | ख (५.३) | from the quivers |
| निश्चचार | निश्चचार (निस्√चर् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | came out |
| हुताशनः | हुत–अशन (१.१) | fire |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | फ | ली | कृ | त | य | त्न | स्य |
| क्ष | त | बा | ण | स्य | श | म्भु | ना |
| गा | ण्डी | व | ध | न्व | नः | खे | भ्यो |
| नि | श्च | चा | र | हु | ता | श | नः |
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