अन्वयः
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शिवशिलीमुखैः भिन्नः कपिध्वजः पत्रिणाम् पङ्क्तिम् विलङ्घ्य, ज्यायः वीर्यम् समाश्रित्य, न चकम्पे ।
English Summary
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Though pierced by Shiva's arrows, Arjuna (the monkey-bannered one), surpassing the stream of those arrows and resorting to his superior valor, did not tremble.
सारांश
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अपनी बाण-पंक्ति को शिव के बाणों द्वारा छिन्न-भिन्न किए जाने पर भी, श्रेष्ठ पराक्रम के धनी कपिध्वज अर्जुन तनिक भी विचलित नहीं हुए।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
विलङ्घ्येति ॥ शिवशिलीमुखैः पत्रिणां पङ्क्तिं निजशरावलिं विलङ्घ्यातिक्रम्य भिन्नो विद्धः कपिध्वजोऽर्जुनो ज्यायः प्रशस्तम् ।
वृद्धप्रशस्ययोर्ज्यायान् इत्यमरः । वीर्यं सत्त्वमुपाश्रित्यावस्थाय न चकम्पे न चचाल । किं तु तान्सहन्नवतस्थावित्यर्थः ।
पदच्छेदः
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| विलङ्घ्य | विलङ्घ्य (वि√लङ्घ्+ल्यप्) | having surpassed |
| पत्रिणाम् | पत्रिन् (६.३) | of the arrows |
| पङ्क्तिम् | पङ्क्ति (२.१) | the stream |
| भिन्नः | भिन्न (√भिद्+क्त, १.१) | pierced |
| शिवशिलीमुखैः | शिव–शिलीमुख (३.३) | by Shiva's arrows |
| ज्यायः | ज्ययस् (२.१) | greater |
| वीर्यम् | वीर्य (२.१) | valor |
| समाश्रित्य | समाश्रित्य (सम्+आ√श्रि+ल्यप्) | having resorted to |
| न | न | not |
| चकम्पे | चकम्पे (√कम्प् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | trembled |
| कपिध्वजः | कपि–ध्वज (१.१) | he whose banner is a monkey (Arjuna) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | ल | ङ्घ्य | प | त्रि | णां | प | ङ्क्तिं |
| भि | न्नः | शि | व | शि | ली | मु | खैः |
| ज्या | यो | वी | र्यं | स | मा | श्रि | त्य |
| न | च | क | म्पे | क | पि | ध्व | जः |
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