अन्वयः
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ईशे जिष्णौ शरान् मुञ्चति (सति), पिनाक-स्वन-पूरितः (धनुः) आशाः ध्वनयन् धरा-धरः स्फुटन् इव दध्वान ।
English Summary
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As the Lord (Shiva) released arrows at Jishnu (Arjuna), the Pinaka bow, filled with its own twang, resounded, making the quarters echo, as if the mountain (Himalaya) itself was splitting apart.
सारांश
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जब महादेव ने अर्जुन पर बाण छोड़े, तब पिनाक धनुष की टंकार से संपूर्ण दिशाएं किसी फटते हुए पर्वत के समान गूँज उठीं।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
मुञ्चतीति ॥ ईशे हरे कर्तरि जिष्णावर्जुने विषये शरान्मुञ्चति सति पिनाकस्य शिवकार्मुकस्य स्वनेन ध्वनिना पूरितो धराधर इन्द्रकीलः स्फुटन्निव विदीर्यमाण इवेत्युत्प्रेक्षा । आशा दिशो ध्वनयञ्शब्दयुक्ताः कुर्वन्दध्वान शब्दमकरोत् ।
दिशस्तु ककुभः काष्ठा आशाश्व हरितश्च ताः इत्यमरः (अमरकोशः १.३.१ ) ॥ तद्गणां ददृशुर्भीमं चित्रसंस्था इवाचलाः । विस्मयेन तयोर्युद्धं चित्रसंस्था इवाचलाः
पदच्छेदः
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| मुञ्चति | मुञ्चत् (√मुच्+शतृ, ७.१) | while releasing |
| ईशे | ईश (७.१) | the Lord (Shiva) |
| शरान् | शर (२.३) | arrows |
| जिष्णौ | जिष्णु (७.१) | at Jishnu (Arjuna) |
| पिनाकस्वनपूरितः | पिनाक–स्वन–पूरित (√पॄ+णिच्+क्त, १.१) | filled with the sound of the Pinaka bow |
| दध्वान | दध्वान (√ध्वन् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | resounded |
| ध्वनयन् | ध्वनयत् (√ध्वन्+णिच्+शतृ, १.१) | making echo |
| आशाः | आशा (२.३) | the quarters |
| स्फुटन् | स्फुटत् (√स्फुट्+शतृ, १.१) | splitting |
| इव | इव | as if |
| धराधरः | धरा–धर (१.१) | the mountain |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मु | ञ्च | ती | शे | श | रा | ञ्जि | ष्णौ |
| पि | ना | क | स्व | न | पू | रि | तः |
| द | ध्वा | न | ध्व | न | य | न्ना | शाः |
| स्फु | ट | न्नि | व | ध | रा | ध | रः |
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