अन्वयः
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शत्रोः दुरुत्तरे महा-इषु-जलधौ वर्तमाना पताकिनी ईशानम् पारम् इव प्राप्य आशश्वास ।
English Summary
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The army (of the Ganas), which was in the enemy's (Arjuna's) great ocean of arrows, difficult to cross, found relief upon reaching Ishana (Shiva), as if reaching the other shore.
सारांश
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शत्रु के बाण रूपी दुस्तर महासागर में फंसी हुई वह सेना शिव को एक सुरक्षित किनारे के समान पाकर आश्वस्त हुई।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
महेष्विति ॥ दुरुत्तरे दुस्तरे शत्रोः संबन्धिनि महेषुजलधौ महति बाणसागरे वर्तमाना पताकिनी सेनेशानं शिवं पारं परतीरमिव !
पारावारे परार्वाची इत्यमरः (अमरकोशः १.१०.८ ) । प्राप्याशश्वास प्राणिति स्म ।
पदच्छेदः
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| महेषुजलधौ | महा–इषु–जलधि (७.१) | in the great ocean of arrows |
| शत्रोः | शत्रु (६.१) | of the enemy |
| वर्तमाना | वर्तमान (√वृत्+शानच्, १.१) | being |
| दुरुत्तरे | दुर्–उत्तर (७.१) | difficult to cross |
| प्राप्य | प्राप्य (प्र√आप्+ल्यप्) | having reached |
| पारम् | पार (२.१) | the other shore |
| इव | इव | as if |
| ईशानम् | ईशान (२.१) | Ishana (Shiva) |
| आशश्वास | आशश्वास (आ√श्वस् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | found relief |
| पताकिनी | पताकिनी (१.१) | the army |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | हे | षु | ज | ल | धौ | श | त्रो |
| र्व | र्त | मा | ना | दु | रु | त्त | रे |
| प्रा | प्य | पा | र | मि | वे | शा | न |
| मा | श | श्वा | स | प | ता | कि | नी |
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