अन्वयः
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त्यक्त-अपास्त-देवत्व-मानुष्यक-परिग्रहैः ज्वलित-अन्य-गुणैः (भवद्भिः) तेजसि स्थिता गुर्वी मान्यता किम्?
English Summary
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What is the use of this great honor of yours, which rests on your prowess, when you have abandoned the acceptance of both your rejected divinity and your humanity, and when your other virtues are now ablaze (i.e., destroyed)?
सारांश
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क्या देवताओं का स्वरूप त्यागकर और मनुष्य शरीर धारण करके भी, अन्य ज्वलंत गुणों से युक्त श्रेष्ठ तेज में स्थित उनकी प्रतिष्ठा समाप्त हो गई?
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
किमिति ॥ अपास्तोऽवधीरितो देवत्वमानुष्यकयोः परिग्रहः स्वीकारो यैस्तैः । अ तिदेवमानुषैरित्यर्थः । मनुष्याणां भावो मानुष्यकम्। योपधाद्गुरूपोत्तमाहुञ्। ज्वलिता उज्ज्वलिताः। प्रकाशिता इति यावत् । अन्यगुणा असदृशगुणा यैस्तैः ।
अन्यौ विभिन्नासदृशौ इति वैजयन्ती । ईदृशैः। भवद्भिरिति शेषः । तेजसि प्रतापे स्थिता प्रतापैकशरणा मानिता शूरत्वाभिमानिता किमिति त्यक्ता। किमिति निर्लज्जैः पलायत इति भावः॥
पदच्छेदः
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| किम् | किम् | what (is the use of) |
| त्यक्तापास्तदेवत्वमानुष्यकपरिग्रहैः | त्यक्त (√त्यज्+क्त)–अपास्त (अप√अस्+क्त)–देवत्व–मानुष्यक–परिग्रह (३.३) | by those who have abandoned the acceptance of their rejected divinity and humanity |
| ज्वलितान्यगुणैः | ज्वलित (√ज्वल्+क्त)–अन्य–गुण (३.३) | by those whose other virtues are ablaze |
| गुर्वी | गुरु (१.१) | great |
| स्थिता | स्थित (√स्था+क्त, १.१) | resting |
| तेजसि | तेजस् (७.१) | in prowess |
| मान्यता | मान्यता (१.१) | honor |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| किं | त्य | क्ता | पा | स्त | दे | व | त्व |
| मा | नु | ष्य | क | प | रि | ग्र | हैः |
| ज्व | लि | ता | न्य | गु | णै | र्गु | र्वी |
| स्थि | ता | ते | ज | सि | मा | न्य | ता |
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