प्रतिदिशं प्लवगाधिपलक्ष्मणा
विशिखसंहतितापितमूर्तिभिः ।
रविकरग्लपितैरिव वारिभिः
शिवबलैः परिमण्डलता दधे ॥
प्रतिदिशं प्लवगाधिपलक्ष्मणा
विशिखसंहतितापितमूर्तिभिः ।
रविकरग्लपितैरिव वारिभिः
शिवबलैः परिमण्डलता दधे ॥
विशिखसंहतितापितमूर्तिभिः ।
रविकरग्लपितैरिव वारिभिः
शिवबलैः परिमण्डलता दधे ॥
अन्वयः
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प्लवग-अधिप-लक्ष्मणा विशिख-संहति-तापित-मूर्तिभिः शिव-बलैः, रवि-कर-ग्लपितैः वारिभिः इव, प्रति-दिशम् परिमण्डलता दधे ।
English Summary
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Tormented by the multitude of arrows from Arjuna (whose emblem is Hanuman), Shiva's forces formed a circle in every direction, just as pools of water, dried up by the sun's rays, shrink into circular shapes.
सारांश
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कपिराज हनुमान के चिह्न वाली ध्वजा वाले अर्जुन के बाणों से पीड़ित शिव की सेना, सूर्य की किरणों से सूखते जल के समान, प्रत्येक दिशा में मंडल बनाकर खड़ी हो गई।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
प्रतिदिशमिति ॥ प्लवगानामधिपोऽधीशो लक्ष्म यस्य तेन वानरचिहेन ।
कपिप्लवङ्गप्लवग- इति, चिह्नं लक्ष्म च लक्षणम् इति चामरः । अर्जुनेन विशिखसंहतितापितमूर्तिभिरिति विशिखा बाणास्तेषां संहृतयः समूहाः। स्त्रियां तु संहृतिवृन्दम् इत्यमरः (अमरकोशः २.५.४३ ) । ताभिस्तापिताः पीडिता मूर्तयो देहा येषां तैस्तथाभूतैः । शरनिकरकर्तितकलेवरैरित्यर्थः। शिवबलैः प्रथमसैन्यैः कर्तृभिः रविकरेण ग्लपितैः सूर्यकिरणशोषितैर्वारिभिरुदकैरिव प्रतिदिशं दिक्षु परिमण्डलता । परितश्चक्राकारमण्डलतेति यावत् ।" दधेऽधारि।प्रतिदिशं मण्डलाकारेण स्थितमित्यर्थः।धाञ: कर्मणि लिट्। आतपतप्तं हि नीरं परिभ्रमति तद्वन्मुनिपीडितं सैन्यं बभ्रामेत्यर्थः। द्रुतविलम्बितं छन्दःद्रुतविलम्बितम्ग्रह नभौ भरौ इति लक्षणात् ॥
पदच्छेदः
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| प्रति-दिशम् | प्रति–दिश (२.१) | in every direction |
| प्लवग-अधिप-लक्ष्मणा | प्लवग–अधिप–लक्ष्मन् (३.१) | by him whose emblem is the lord of monkeys (Arjuna) |
| विशिख-संहति-तापित-मूर्तिभिः | विशिख–संहति–तापित–मूर्ति (३.३) | by those whose bodies were tormented by a multitude of arrows |
| रवि-कर-ग्लपितैः | रवि–कर–ग्लपित (३.३) | by those dried up by the sun's rays |
| इव | इव | like |
| वारिभिः | वारि (३.३) | by waters |
| शिव-बलैः | शिव–बल (३.३) | by Shiva's forces |
| परिमण्डलता | परिमण्डल–ता (१.१) | the state of forming a circle |
| दधे | दधे (√धा कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was formed |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | ति | दि | शं | प्ल | व | गा | धि | प | ल | क्ष्म | णा |
| वि | शि | ख | सं | ह | ति | ता | पि | त | मू | र्ति | भिः |
| र | वि | क | र | ग्ल | पि | तै | रि | व | वा | रि | भिः |
| शि | व | ब | लैः | प | रि | म | ण्ड | ल | ता | द | धे |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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