द्विषां क्षतीर्याः प्रथमे शिलामुखा
विभिद्य देहावरणानि चक्रिरे ।
न तासु पेते विशिखैः पुनर्मुने-
ररुंतुदत्वं महतां ह्यगोचरः ॥
द्विषां क्षतीर्याः प्रथमे शिलामुखा
विभिद्य देहावरणानि चक्रिरे ।
न तासु पेते विशिखैः पुनर्मुने-
ररुंतुदत्वं महतां ह्यगोचरः ॥
विभिद्य देहावरणानि चक्रिरे ।
न तासु पेते विशिखैः पुनर्मुने-
ररुंतुदत्वं महतां ह्यगोचरः ॥
अन्वयः
AI
याः प्रथमे शिलामुखाः द्विषाम् देह-आवरणानि विभिद्य क्षतीः चक्रिरे, तासु मुनेः विशिखैः पुनः न पेते । हि महताम् अरुंतुदत्वम् अगोचरः ।
English Summary
AI
The arrows that first pierced the enemies' armor and created wounds did not fall again into those same wounds from the sage's (Arjuna's) subsequent shots. Indeed, the act of striking an already wounded spot is beyond the practice of the great-souled.
सारांश
AI
अर्जुन के बाणों ने शत्रुओं के शरीर पर उन्हीं स्थानों पर प्रहार नहीं किया जहाँ पहले से घाव थे; महान पुरुष दुःखियों को और अधिक कष्ट नहीं देते।
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
द्विषामिति ॥ प्रथमे । प्रथममुक्ता इत्यर्थः । शिलीमुखा मुनिशरा द्विषां देहावरणानि वर्माणि विभिद्य याः क्षतीः प्रहारांश्चक्रिरे । तासु क्षतिषु पुनः पश्चात्प्रयुक्तैर्मुनेर्विशिखैर्न पेते न पतितम् । पिष्टपेषणदोषापातादिति भावः । तथा हि । अरुंतुदत्वं पीडितपीडनं सतामगोचरोऽविषयं हि । सन्तः पीडितपीडां न कुर्वन्तीत्यर्थः ।
न हन्याद्व्यसनप्राप्तं नार्तं नातिपरिक्षतम् इति निषेधस्मरणादिति भावः। अरुर्व्रणं तुदतीति अरुंतुदः।व्रणोऽस्त्रियामीर्ममरुः इत्यमरः (अमरकोशः २.६.५४ ) । विध्वरुषोस्तुदः (अष्टाध्यायी ३.२.३५ ) इति खश्प्रत्ययः । अरुर्द्विषदजन्तस्य मुम् (अष्टाध्यायी ६.३.६७ ) इति मुमागमः ॥
पदच्छेदः
AI
| द्विषाम् | द्विष् (६.३) | of the enemies |
| क्षतीः | क्षति (२.३) | wounds |
| याः | यद् (१.३) | which |
| प्रथमे | प्रथम (७.१) | at first |
| शिलामुखाः | शिलामुख (१.३) | arrows |
| विभिद्य | विभिद्य (वि√भिद्+ल्यप्) | having pierced |
| देह-आवरणानि | देह–आवरण (२.३) | body armors |
| चक्रिरे | चक्रिरे (√कृ कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | made |
| न | न | not |
| तासु | तद् (७.३) | in them |
| पेते | पेते (√पत् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | fell |
| विशिखैः | विशिख (३.३) | arrows |
| पुनः | पुनर् | again |
| मुनेः | मुनि (६.१) | of the sage |
| अरुंतुदत्वम् | अरुस्–तुद्–अरुंतुदत्व (१.१) | the act of striking a sore spot |
| महताम् | महत् (६.३) | of the great |
| हि | हि | for |
| अगोचरः | अगोचर (१.१) | is beyond the scope |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द्वि | षां | क्ष | ती | र्याः | प्र | थ | मे | शि | ला | मु | खा |
| वि | भि | द्य | दे | हा | व | र | णा | नि | च | क्रि | रे |
| न | ता | सु | पे | ते | वि | शि | खैः | पु | न | र्मु | ने |
| र | रुं | तु | द | त्वं | म | ह | तां | ह्य | गो | च | रः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.