यष्टुमिच्छसि पितॄन्न साम्प्रतं
संवृतोऽर्चिचयिषुर्दिवौकसः ।
दातुमेव पदवीमपि क्षमः
किं मृगेऽङ्ग विशिखं न्यवीविशः ॥
यष्टुमिच्छसि पितॄन्न साम्प्रतं
संवृतोऽर्चिचयिषुर्दिवौकसः ।
दातुमेव पदवीमपि क्षमः
किं मृगेऽङ्ग विशिखं न्यवीविशः ॥
संवृतोऽर्चिचयिषुर्दिवौकसः ।
दातुमेव पदवीमपि क्षमः
किं मृगेऽङ्ग विशिखं न्यवीविशः ॥
अन्वयः
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साम्प्रतम् पितॄन् यष्टुम् न इच्छसि, दिवौकसः अर्चिचयिषुः (अपि) न संवृतः । (त्वम्) पदवीम् अपि दातुम् एव क्षमः (असि) । अङ्ग, मृगे विशिखम् किम् न्यवीविशः?
English Summary
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It is not proper for you now to wish to worship the ancestors, nor have you become desirous of worshipping the gods. You are capable of giving away even your high status. O friend, why then did you shoot your arrow at a mere boar?
सारांश
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तुम न तो पितरों का तर्पण करना चाहते हो और न देवताओं की पूजा। फिर मार्ग देने में सक्षम होते हुए भी तुमने मृग पर बाण क्यों चलाया?
घण्टापथव्याख्या (मल्लिनाथः)
यष्टुमिति ॥ सांप्रतं संप्रति ।
संप्रतीदानीमधुना सांप्रतं तथा इत्यमरः (अमरकोशः ३.४.२३ ) । पितृन्कव्यवाडादीन्यष्टुमर्चयितुं नेच्छसि । यतः संवृत एकान्ते स्थितः। तथा दिवौकसो देवानर्चिचयिषुरप्यर्चयितुमिच्छुरपि नासि । अतो न पित्रर्थेयं हिंसा, नापि देवतार्था । तदाराधने तद्विहितत्वादिति भावः। अथ सर्वत आत्मानं गोपायीत इति श्रुतेरात्मरक्षार्थमिति चेन्नेत्याह-दातुमिति । अङ्ग हे, पदवीं मार्गं दातुमेव । न तु हन्तुम् । मुनित्वादिति भावः । क्षभोऽपि योग्यः सन्नपि । किं किमर्थं मृगे विशिखं न्यवीविशो निवेशितवान् । विशतेर्ण्यन्ताल्लुङ् । अभिधावतो मृगादपसरणेनैवात्मरक्षणे कर्तव्ये यवधीस्तच्चापलमेव । न हिंस्यात्सर्वाभूतानि इति श्रुतिनिषेधादिति भावः ॥ किं बहुना परमार्थः श्रूयतामित्याह
पदच्छेदः
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| यष्टुम् | यष्टुम् (√यज्+तुमुन्) | to worship |
| इच्छसि | इच्छसि (√इष् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you wish |
| पितॄन् | पितृ (२.३) | the ancestors |
| न | न | not |
| साम्प्रतम् | साम्प्रतम् | now/it is not proper |
| संवृतः | संवृत (सम्√वृ+क्त, १.१) | you have become |
| अर्चिचयिषुः | अर्चिचयिषु (√अर्च्+सन्+उ, १.१) | desirous of worshipping |
| दिवौकसः | दिवौकस् (२.३) | the gods |
| दातुम् | दातुम् (√दा+तुमुन्) | to give |
| एव | एव | even |
| पदवीम् | पदवी (२.१) | position |
| अपि | अपि | also |
| क्षमः | क्षम (१.१) | capable |
| किम् | किम् | why |
| मृगे | मृग (७.१) | on the boar |
| अङ्ग | अङ्ग | O friend |
| विशिखम् | विशिख (२.१) | arrow |
| न्यवीविशः | न्यवीविशः (नि√विश् +णिच् कर्तरि लुङ् (परस्मै.) म.पु. एक.) | did you shoot |
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | ष्टु | मि | च्छ | सि | पि | तॄ | न्न | सा | म्प्र | तं |
| सं | वृ | तो | ऽर्चि | च | यि | षु | र्दि | वौ | क | सः |
| दा | तु | मे | व | प | द | वी | म | पि | क्ष | मः |
| किं | मृ | गे | ऽङ्ग | वि | शि | खं | न्य | वी | वि | शः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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